अध्याय 3: जानें कैसे चुनें अपने निवेश के लिए सबसे उपयुक्त इंडेक्स : निफ्टी, सेंसेक्स और अन्य | How To Choose Best Index To Invest

कैसे चुनें अपने निवेश के लिए सबसे उपयुक्त इंडेक्स
कैसे चुनें अपने निवेश के लिए सबसे उपयुक्त इंडेक्स

अब तक आपने अध्याय -1 में जाना की इंडेक्स फंड क्या  होता है । अध्याय -2 में आपने जाना की क्या इंडेक्स फंड सेफ हैं। अब यदि आप अपना मन इंडेक्स फंड में निवेश करने का बना चुके हो तो सबसे पहला सवाल ये आता है की कोनसे इंडेक्स में निवेश करना आपके लिए सबसे उपयुक्त है। तो चलिए आइये इस आर्टिकल के माध्यम से हम जानेंगे की आप कैसे चुनें अपने निवेश के लिए सबसे उपयुक्त इंडेक्स। How To Choose Best Index To Invest.

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जब नीरज को चुनना पड़ा

नीरज ने फैसला कर लिया था कि वे इंडेक्स फंड में निवेश करेंगे। उन्होंने किताबें पढ़ीं, यूट्यूब विडियो देखे, और समझ गए कि यह उनके लिए सही विकल्प है। फिर वे अपने लैपटॉप पर म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म खोलकर बैठे। “इंडेक्स फंड” सर्च किया तो सामने आ गईं दर्जनों स्कीम्स।

निफ्टी पचास इंडेक्स फंड, सेंसेक्स इंडेक्स फंड, निफ्टी सौ इंडेक्स फंड, निफ्टी नेक्स्ट पचास, निफ्टी मिडकैप एक सौ पचास, निफ्टी स्मॉलकैप दो सौ पचास, निफ्टी पांच सौ। और यह तो सिर्फ शुरुआत थी। निफ्टी बैंक, निफ्टी आईटी, निफ्टी फार्मा भी थे। फिर निफ्टी नेक्स्ट पचास जूनियर और भी न जाने क्या-क्या।

नीरज का सिर चकरा गया। उन्होंने सोचा था कि इंडेक्स फंड चुनना आसान होगा। लेकिन अब उन्हें लग रहा था कि यह तो म्यूचुअल फंड चुनने जितना ही मुश्किल है। कौन सा इंडेक्स बेहतर है? क्या निफ्टी और सेंसेक्स में कोई फर्क है? क्या एक से ज्यादा इंडेक्स फंड लेना चाहिए?

अगर आप भी नीरज की तरह उलझन में हैं, तो यह अध्याय आपके लिए है। आइए धीरे-धीरे, आसान भाषा में समझते हैं कि भारत के प्रमुख इंडेक्स क्या हैं और आपके लिए कौन सा सही है।

सेंसेक्स – भारतीय शेयर बाजार की धड़कन

सेंसेक्स भारत का सबसे पुराना और सबसे मशहूर इंडेक्स है। जब भी टीवी या अखबार में शेयर बाजार की खबर आती है, तो पहला सवाल यही होता है – “सेंसेक्स कहां बंद हुआ?” यह एक तरह से भारतीय शेयर बाजार का तापमान है।

सेंसेक्स का पूरा नाम है “सेंसिटिव इंडेक्स”। इसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज ने बनाया है। यह भारत की तीस सबसे बड़ी और सबसे एक्टिव कंपनियों को ट्रैक करता है। यह इंडेक्स पहली जनवरी उन्नीस सौ अस्सी को एक सौ अंक से शुरू हुआ था। आज यह बाईस हजार से ऊपर है।

सोचिए, उन्नीस सौ अस्सी में अगर किसी ने सौ रुपये लगाए होते, तो आज वह दो सौ बीस गुना बढ़कर बाईस हजार रुपये हो जाता। यह है लंबी अवधि के निवेश की ताकत।

सेंसेक्स में कौन सी कंपनियां हैं? वही जो आप रोज देखते हैं और इस्तेमाल करते हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज जिसका जियो सिम आपके फोन में है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और इन्फोसिस जो पूरी दुनिया को सॉफ्टवेयर सेवाएं देते हैं। एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जहां आपका अकाउंट हो सकता है। हिंदुस्तान यूनिलीवर जिसके लक्स साबुन और ब्रुक बॉन्ड चाय आपके घर में होगी।

लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। सेंसेक्स में केवल तीस कंपनियां हैं, इसलिए हर कंपनी का वेटेज थोड़ा ज्यादा होता है। अगर टॉप तीन-चार कंपनियां अच्छा करती हैं तो पूरा सेंसेक्स अच्छा करता है। और अगर वे खराब करती हैं तो सेंसेक्स भी प्रभावित होता है। यह अच्छी बात भी है और थोड़ा रिस्की भी।

निफ्टी पचास – नया लेकिन ज्यादा लोकप्रिय

निफ्टी का पूरा नाम है “नेशनल फिफ्टी”। इसे नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने बनाया है। यह सेंसेक्स से नया है – उन्नीस सौ छियानवे में शुरू हुआ। लेकिन आज यह सेंसेक्स से भी ज्यादा इस्तेमाल होता है।

क्यों? क्योंकि निफ्टी में तीस नहीं बल्कि पचास कंपनियां हैं। यानी थोड़ा ज्यादा विविधता। और यह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का इंडेक्स है जो आज भारत का सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक स्टॉक एक्सचेंज है।

निफ्टी पचास भारत के इक्विटी मार्केट का लगभग पैंसठ प्रतिशत कवर करता है। मतलब अगर आप भारत की सभी लिस्टेड कंपनियों की कुल वैल्यू जोड़ें, तो इन पचास कंपनियों की वैल्यू उसका पैंसठ प्रतिशत होगी। तो जब आप निफ्टी इंडेक्स फंड में निवेश करते हैं, तो आप भारत के दो-तिहाई शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं।

निफ्टी में भी वही दिग्गज कंपनियां हैं जो सेंसेक्स में हैं। लेकिन बीस और कंपनियां भी हैं। जैसे कि पावर ग्रिड, ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन, कोल इंडिया जैसी सरकारी कंपनियां। अल्ट्राटेक सीमेंट, ग्रासिम इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी प्राइवेट कंपनियां।

ज्यादातर नए निवेशकों के लिए निफ्टी पचास बेहतर विकल्प है। क्यों? एक तो यह ज्यादा कंपनियों को कवर करता है। दूसरा, आजकल ज्यादातर इंडेक्स फंड्स निफ्टी को ही ट्रैक करते हैं, तो आपके पास ज्यादा विकल्प हैं। तीसरा, निफ्टी के आधार पर ही बाकी सारे इंडेक्स बने हैं।

निफ्टी और सेंसेक्स में फर्क – क्या वाकई मायने रखता है?

अब सवाल यह है कि निफ्टी चुनें या सेंसेक्स? कविता इसी उलझन में थीं। उन्होंने दोनों का पिछले दस साल का परफॉर्मेंस देखा। निफ्टी ने औसतन बारह दशमलव तीन प्रतिशत दिया था और सेंसेक्स ने बारह दशमलव पांच प्रतिशत। यानी लगभग बराबर।

तो फर्क क्या है? दरअसल, बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों ही भारत की सबसे बड़ी कंपनियों को ट्रैक करते हैं। दोनों में रिलायंस, एचडीएफसी बैंक, टीसीएस, इन्फोसिस जैसी कंपनियां हैं। तो परफॉर्मेंस भी लगभग एक जैसा होता है।

अंतर बस इतना है कि निफ्टी में बीस ज्यादा कंपनियां हैं, तो थोड़ा ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन है। और निफ्टी पर आधारित ज्यादा प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं – इंडेक्स फंड्स, ईटीएफ, फ्यूचर्स, ऑप्शन्स।

कविता ने फैसला किया कि वे निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में निवेश करेंगी। उन्हें लगा कि पचास कंपनियां तीस से बेहतर हैं। और जैसा कि हमने देखा, परफॉर्मेंस में कोई खास फर्क नहीं है तो क्यों न थोड़ी ज्यादा विविधता ली जाए।

निफ्टी नेक्स्ट पचास – दूसरी पंक्ति के सितारे

अब जब आप निफ्टी पचास को समझ गए हैं, तो एक और दिलचस्प इंडेक्स देखते हैं। निफ्टी नेक्स्ट पचास। यह नाम से ही साफ है – निफ्टी की अगली पचास कंपनियां। यानी पचास से लेकर सौ नंबर तक की कंपनियां।

इसे ऐसे समझिए। निफ्टी पचास में भारत की सबसे बड़ी पचास कंपनियां हैं। लेकिन भारत में और भी बड़ी कंपनियां हैं जो टॉप पचास में नहीं आतीं। पचास एक से सौ नंबर तक की कंपनियां निफ्टी नेक्स्ट पचास में होती हैं।

इसे कभी-कभी “जूनियर निफ्टी” भी कहा जाता है। यहां कौन सी कंपनियां हैं? मदर डेयरी, डाबर, गोदरेज कंज्यूमर, पेज इंडस्ट्रीज (जो जॉकी अंडरवियर बनाती है), एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डीमार्ट), एड्लाब्स, अडानी एंटरप्राइजेज जैसी कंपनियां।

ये कंपनियां टॉप पचास से छोटी हैं, लेकिन फिर भी काफी बड़ी और स्थापित हैं। और इनमें ग्रोथ की संभावना थोड़ी ज्यादा है। क्योंकि जो कंपनी पहले से बहुत बड़ी है, वह तीस-चालीस प्रतिशत हर साल नहीं बढ़ सकती। लेकिन जो अभी मझोली है, वह तेजी से बढ़ सकती है।

इसलिए निफ्टी नेक्स्ट पचास का रिटर्न कभी-कभी निफ्टी पचास से ज्यादा होता है। लेकिन उतार-चढ़ाव भी थोड़ा ज्यादा होता है। जब बाजार में तेजी होती है तो ये कंपनियां ज्यादा तेजी से बढ़ती हैं। और जब मंदी आती है तो ज्यादा गिरती भी हैं।

निफ्टी सौ – दोनों का मेल

अब सोचिए, अगर निफ्टी पचास और निफ्टी नेक्स्ट पचास को मिला दें तो क्या बनेगा? निफ्टी सौ। बिल्कुल सही। यह इंडेक्स भारत की टॉप सौ कंपनियों को ट्रैक करता है।

राजेश को यह आइडिया बहुत पसंद आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न एक ही इंडेक्स फंड लिया जाए जो सौ कंपनियों को कवर करे। निफ्टी पचास की स्थिरता भी मिलेगी और निफ्टी नेक्स्ट पचास की ग्रोथ पोटेंशियल भी।

निफ्टी सौ भारत के इक्विटी मार्केट का लगभग अस्सी प्रतिशत कवर करता है। तो यह काफी व्यापक है। लेकिन यहां एक बात समझनी जरूरी है। निफ्टी सौ में भी टॉप दस-पंद्रह कंपनियों का वेटेज काफी ज्यादा होता है। तो असल में यह निफ्टी पचास से बहुत अलग नहीं है।

फिर भी, अगर आप थोड़ी ज्यादा विविधता चाहते हैं और एक ही इंडेक्स फंड से काम चलाना चाहते हैं, तो निफ्टी सौ अच्छा विकल्प है। खासकर उन लोगों के लिए जो सिंपल रखना पसंद करते हैं।

निफ्टी पांच सौ – लगभग पूरा बाजार

निफ्टी पांच सौ जैसा कि नाम से पता चलता है, भारत की टॉप पांच सौ कंपनियों को ट्रैक करता है। यह लगभग पूरे भारतीय शेयर बाजार को कवर करता है – नब्बे प्रतिशत से ज्यादा।

प्रिया को लगा कि यह सबसे बेहतरीन होगा। पांच सौ कंपनियां मतलब पूरा डाइवर्सिफिकेशन। बड़ी कंपनियां भी, मझोली भी, और कुछ छोटी भी। हर सेक्टर कवर हो जाएगा। और सबसे बड़ी बात, अगर कोई एक-दो कंपनी डूबती भी है तो प्रिया के पोर्टफोलियो पर बहुत कम फर्क पड़ेगा क्योंकि हर कंपनी का वेटेज बहुत कम होगा।

लेकिन निफ्टी पांच सौ के साथ एक समस्या है। क्योंकि इसमें पांच सौ कंपनियां हैं, इसलिए इसे मैनेज करना थोड़ा मुश्किल है। एक्सपेंस रेशियो थोड़ा ज्यादा हो सकता है। और छोटी कंपनियों के शेयर खरीदने-बेचने में ट्रांजेक्शन कॉस्ट भी ज्यादा होती है।

फिर भी, अगर आप पूरे भारतीय बाजार में निवेश करना चाहते हैं और आपको लगता है कि सिर्फ पचास या सौ कंपनियां काफी नहीं हैं, तो निफ्टी पांच सौ एक अच्छा विकल्प है। लेकिन ध्यान रखिए कि इसका परफॉर्मेंस भी लगभग निफ्टी पचास जैसा ही होता है। क्योंकि बड़ी कंपनियों का वेटेज हर इंडेक्स में ज्यादा होता है।

मिडकैप और स्मॉलकैप – थोड़ा एडवेंचर

अब तक हमने जितने भी इंडेक्स देखे, वे सब लार्ज कैप यानी बड़ी कंपनियों पर आधारित थे। लेकिन भारतीय शेयर बाजार में मझोली और छोटी कंपनियां भी हैं। और उनके लिए भी इंडेक्स हैं।

निफ्टी मिडकैप एक सौ पचास उन कंपनियों को ट्रैक करता है जो लार्ज कैप से छोटी हैं लेकिन फिर भी अच्छी साइज की हैं। ये कंपनियां तेजी से बढ़ रही होती हैं। इनमें निवेश का रिटर्न ज्यादा हो सकता है लेकिन रिस्क भी ज्यादा होता है।

अमन को लगा कि थोड़ा एडवेंचर ठीक रहेगा। उन्होंने अपने निवेश का अस्सी प्रतिशत निफ्टी पचास में रखा और बीस प्रतिशत मिडकैप इंडेक्स फंड में। उनकी सोच थी कि अगर मिडकैप अच्छा करेगा तो ज्यादा रिटर्न मिलेगा। और अगर खराब करेगा तो भी ज्यादातर पैसा निफ्टी पचास में सुरक्षित है।

यह एक अच्छी रणनीति है। लेकिन याद रखिए, मिडकैप में उतार-चढ़ाव बहुत ज्यादा होता है। कभी-कभी यह एक साल में पचास प्रतिशत बढ़ जाता है। और कभी-कभी तीस-चालीस प्रतिशत गिर भी जाता है। तो इसके लिए मजबूत दिल चाहिए।

निफ्टी स्मॉलकैप दो सौ पचास और भी छोटी कंपनियों को ट्रैक करता है। ये कंपनियां सबसे ज्यादा जोखिम वाली होती हैं लेकिन अगर सब कुछ ठीक रहा तो सबसे ज्यादा रिटर्न भी दे सकती हैं। लेकिन नए निवेशकों को स्मॉलकैप से दूर ही रहना चाहिए। या फिर बहुत कम हिस्सा रखना चाहिए।

सेक्टोरल इंडेक्स – विशेष स्वाद

कभी-कभी आपको लगता है कि किसी खास सेक्टर में बहुत ग्रोथ होने वाली है। मान लीजिए आपको लगता है कि आने वाले वर्षों में बैंकिंग सेक्टर बहुत अच्छा करेगा। तो आप निफ्टी बैंक इंडेक्स फंड में निवेश कर सकते हैं। इसमें केवल बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विस की कंपनियां होती हैं।

या आपको लगता है कि आईटी सेक्टर में तेजी आने वाली है। तो निफ्टी आईटी इंडेक्स फंड है। फार्मा सेक्टर के लिए निफ्टी फार्मा है। ऑटो सेक्टर के लिए निफ्टी ऑटो है।

लेकिन यहां बड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। जब आप सेक्टोरल इंडेक्स में निवेश करते हैं, तो आप दांव लगा रहे हैं कि यह सेक्टर अच्छा करेगा। अगर गलत हो गए तो भारी नुकसान हो सकता है।

२०२१-२२ में बहुत से लोगों ने सोचा कि आईटी सेक्टर बहुत अच्छा करेगा क्योंकि कोविड के बाद डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन बढ़ गया था। उन्होंने निफ्टी आईटी इंडेक्स फंड में पैसा लगाया। लेकिन २०२२-२३ में जब अमेरिका में मंदी के संकेत आए तो आईटी सेक्टर बुरी तरह गिर गया। बहुत से निवेशकों को भारी नुकसान हुआ।

इसलिए सेक्टोरल इंडेक्स फंड्स केवल उन लोगों के लिए हैं जो बाजार को अच्छी तरह समझते हैं और रिस्क ले सकते हैं। आम निवेशकों को इनसे दूर रहना चाहिए। निफ्टी पचास या निफ्टी सौ जैसे ब्रॉड मार्केट इंडेक्स बहुत बेहतर हैं।

कौन सा इंडेक्स किसके लिए सही है?

अब सबसे बड़ा सवाल – आपके लिए कौन सा इंडेक्स सही है? आइए अलग-अलग निवेशकों को देखते हैं।

रोहन पच्चीस साल के हैं और पहली बार निवेश कर रहे हैं। उन्हें बिल्कुल सरल चाहिए। कोई उलझन नहीं। उनके लिए सबसे अच्छा है निफ्टी पचास इंडेक्स फंड। एक ही फंड, भारत की पचास सबसे बड़ी कंपनियां, समझने में आसान।

मीना पैंतीस साल की हैं और उनके पास पहले से कुछ निवेश हैं। वे थोड़ी ज्यादा विविधता चाहती हैं। उनके लिए निफ्टी सौ या निफ्टी पांच सौ बेहतर हो सकता है। या फिर वे सत्तर प्रतिशत निफ्टी पचास में और तीस प्रतिशत निफ्टी नेक्स्ट पचास में रख सकती हैं।

विक्रम पैंतालीस साल के हैं और उनके पास अच्छी बचत है। वे थोड़ा रिस्क ले सकते हैं। उनके लिए एक मिश्रण अच्छा हो सकता है – साठ प्रतिशत निफ्टी पचास, बीस प्रतिशत निफ्टी नेक्स्ट पचास, और बीस प्रतिशत मिडकैप। यह उन्हें स्थिरता भी देगा और ग्रोथ की संभावना भी।

लेकिन याद रखिए, जितना ज्यादा आप कॉम्प्लेक्स बनाएंगे, उतना ही ज्यादा आपको मॉनिटर करना पड़ेगा। अगर आप सिंपल जीवन चाहते हैं तो सिर्फ एक निफ्टी पचास या निफ्टी सौ इंडेक्स फंड काफी है। सच कहें तो ज्यादातर लोगों के लिए यही बेहतर है।

इंडेक्स चुनने के तीन सुनहरे नियम

पहला नियम – सरलता को प्राथमिकता दीजिए। जितना सरल होगा, उतना अच्छा। अगर आप तय नहीं कर पा रहे तो निफ्टी पचास चुन लीजिए। यह सबसे पॉपुलर है और सबसे ज्यादा समझा जाता है।

दूसरा नियम – ज्यादा इंडेक्स मत लीजिए। दो-तीन से ज्यादा इंडेक्स फंड रखने की जरूरत नहीं है। बहुत से लोग सोचते हैं कि ज्यादा फंड मतलब ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन। लेकिन असल में अगर आपके पास निफ्टी पचास, निफ्टी सौ, और निफ्टी पांच सौ तीनों फंड हैं, तो ज्यादातर कंपनियां तीनों में कॉमन हैं। तो आप सिर्फ कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ा रहे हैं, डाइवर्सिफिकेशन नहीं।

तीसरा नियम – सेक्टोरल इंडेक्स से बचिए जब तक आप एक्सपर्ट न हों। सेक्टोरल इंडेक्स आकर्षक लगते हैं लेकिन खतरनाक हो सकते हैं। अगर आप वाकई किसी सेक्टर में विश्वास रखते हैं और रिस्क उठा सकते हैं, तो अपने पोर्टफोलियो का केवल दस से पंद्रह प्रतिशत उसमें लगाइए। बाकी सब ब्रॉड मार्केट इंडेक्स में ही रखिए।

इंडेक्स बदलते कैसे हैं?

अब एक दिलचस्प सवाल। निफ्टी पचास में हमेशा वही पचास कंपनियां रहती हैं क्या? नहीं। समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं। हर छह महीने में एनएसई की एक कमेटी इंडेक्स की समीक्षा करती है। वे देखते हैं कि कौन सी कंपनी टॉप पचास में आ गई है और कौन सी नीचे चली गई है।

अगर कोई कंपनी पचास से बाहर हो जाती है, तो उसे इंडेक्स से निकाल दिया जाता है। और जो नई कंपनी पचास में आ गई है, उसे शामिल कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया पारदर्शी है और सबको पहले से बता दी जाती है।

जब ऐसा होता है तो आपके इंडेक्स फंड में भी बदलाव होता है। फंड मैनेजर को पुरानी कंपनी के शेयर बेचने पड़ते हैं और नई कंपनी के शेयर खरीदने पड़ते हैं। यह सब अपने आप होता है। आपको कुछ करना नहीं पड़ता।

यही तो इंडेक्स की खूबसूरती है। वह खुद-ब-खुद अपडेट होता रहता है। जो कंपनी अच्छा कर रही है वह अंदर आ जाती है। जो खराब कर रही है वह बाहर चली जाती है। तो इंडेक्स हमेशा भारत की बेहतरीन कंपनियों को ही रिप्रेजेंट करता है।

वेटेज का खेल – बड़ी मछली ज्यादा महत्व रखती है

समीर को एक बात समझ नहीं आई। निफ्टी पचास में पचास कंपनियां हैं। तो क्या सबका बराबर हिस्सा है? हर कंपनी का दो प्रतिशत? नहीं, बिल्कुल नहीं।

निफ्टी पचास और दूसरे ज्यादातर इंडेक्स “मार्केट कैप वेटेड” हैं। इसका मतलब है कि जिस कंपनी का मार्केट कैप ज्यादा है, उसका वेटेज भी ज्यादा होगा। रिलायंस का मार्केट कैप अगर किसी दूसरी कंपनी से दस गुना ज्यादा है, तो निफ्टी में रिलायंस का वेटेज भी उस कंपनी से दस गुना ज्यादा होगा।

इसलिए निफ्टी पचास में टॉप दस कंपनियों का वेटेज लगभग साठ प्रतिशत होता है। रिलायंस का अकेले दस से बारह प्रतिशत। एचडीएफसी बैंक का आठ से नौ प्रतिशत। आईसीआईसीआई बैंक का सात से आठ प्रतिशत। इन्फोसिस और टीसीएस का मिलाकर बारह से तेरह प्रतिशत।

तो जब आप कहते हैं कि आप पचास कंपनियों में निवेश कर रहे हैं, तो यह पूरी तरह सच नहीं है। आपका साठ प्रतिशत पैसा तो सिर्फ दस कंपनियों में है। बाकी चालीस कंपनियों में केवल चालीस प्रतिशत।

क्या यह अच्छा है या बुरा? दोनों। अच्छा इसलिए कि सबसे बड़ी और सबसे स्थिर कंपनियों में आपका ज्यादा पैसा है। बुरा इसलिए कि अगर ये बड़ी कंपनियां खराब परफॉर्म करें तो आपका पूरा पोर्टफोलियो प्रभावित होगा।

लेकिन यही सिस्टम पूरी दुनिया में चलता है। अमेरिका में एसएंडपी पांच सौ भी मार्केट कैप वेटेड है। वहां भी एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी बड़ी कंपनियों का वेटेज ज्यादा है।

फ्री फ्लोट मार्केट कैप – एक और मोड़

रजत को एक और बात कन्फ्यूज कर रही थी। उन्होंने पढ़ा कि निफ्टी “फ्री फ्लोट मार्केट कैप” के आधार पर बनता है। यह क्या है?

मार्केट कैप तो सीधा है – कंपनी के कुल शेयर्स गुना शेयर की कीमत। अगर किसी कंपनी के दस करोड़ शेयर हैं और हर शेयर की कीमत सौ रुपये है, तो मार्केट कैप है एक हजार करोड़ रुपये।

लेकिन फ्री फ्लोट मार्केट कैप थोड़ा अलग है। इसमें केवल वे शेयर गिने जाते हैं जो बाजार में ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध हैं। प्रमोटर के पास जो शेयर हैं, सरकार के पास जो शेयर हैं, या जो शेयर किसी कारण से लॉक-इन हैं, उन्हें नहीं गिना जाता।

मान लीजिए उसी कंपनी में प्रमोटर के पास पांच करोड़ शेयर हैं जो वे नहीं बेचेंगे। तो फ्री फ्लोट केवल पांच करोड़ शेयर हैं। फ्री फ्लोट मार्केट कैप होगा पांच सौ करोड़ रुपये।

निफ्टी में किसी कंपनी का वेटेज इसी फ्री फ्लोट मार्केट कैप के आधार पर तय होता है। इसका फायदा यह है कि जो शेयर असल में बाजार में ट्रेड हो रहे हैं, केवल उन्हीं को गिना जाता है। यह ज्यादा सही तस्वीर देता है।

इंडेक्स रीबैलेंसिंग – क्यों आपका फंड कभी-कभी अंडरपरफॉर्म करता है

नमिता ने देखा कि मार्च के महीने में उनका निफ्टी पचास इंडेक्स फंड थोड़ा अंडरपरफॉर्म कर गया। निफ्टी पचास दो प्रतिशत बढ़ा लेकिन उनका फंड केवल डेढ़ प्रतिशत बढ़ा। क्या हुआ?

यह हुआ इंडेक्स रीबैलेंसिंग के कारण। जब कोई नई कंपनी निफ्टी में शामिल होती है, तो इसकी घोषणा पहले कर दी जाती है। मान लीजिए पंद्रह मार्च को घोषणा हुई कि कंपनी एक्स को तीस मार्च से निफ्टी में शामिल किया जाएगा।

क्या होता है? उस कंपनी के शेयर की कीमत तुरंत बढ़ने लगती है। क्योंकि सब जानते हैं कि सारे इंडेक्स फंड्स को तीस मार्च को यह शेयर खरीदना पड़ेगा। तो लोग पहले ही खरीदने लगते हैं।

जब तीस मार्च को इंडेक्स फंड वाकई खरीदते हैं, तो शेयर पहले से महंगा हो चुका होता है। और जो कंपनी बाहर हो रही है, उसके शेयर की कीमत गिर चुकी होती है क्योंकि लोग जानते हैं कि इंडेक्स फंड्स उसे बेचेंगे।

तो इंडेक्स फंड्स को महंगे में खरीदना पड़ता है और सस्ते में बेचना पड़ता है। इससे थोड़ा नुकसान होता है। यह एक छोटी लागत है जो हर छह महीने में आती है। लेकिन यह चिंता की बात नहीं है। लंबी अवधि में इसका ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।

इक्वल वेटेड इंडेक्स – एक अलग सोच

अधिकतर इंडेक्स मार्केट कैप वेटेड होते हैं। लेकिन कुछ इंडेक्स “इक्वल वेटेड” भी होते हैं। इनमें हर कंपनी का बराबर वेटेज होता है।

मान लीजिए एक इक्वल वेटेड निफ्टी पचास है। इसमें रिलायंस का भी दो प्रतिशत वेटेज होगा और सबसे छोटी कंपनी का भी दो प्रतिशत। तो यह छोटी कंपनियों को ज्यादा महत्व देता है।

क्या यह बेहतर है? कभी-कभी हां, कभी-कभी नहीं। जब छोटी कंपनियां अच्छा कर रही होती हैं तो इक्वल वेटेड इंडेक्स मार्केट कैप वेटेड इंडेक्स को हरा देता है। लेकिन जब बड़ी कंपनियां अच्छा कर रही होती हैं तो मार्केट कैप वेटेड बेहतर होता है।

लंबी अवधि में दोनों का परफॉर्मेंस लगभग बराबर होता है। तो नए निवेशकों को इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। मार्केट कैप वेटेड इंडेक्स ही लीजिए जो सबसे कॉमन और सबसे ज्यादा लिक्विड हैं।

इंटरनेशनल इंडेक्स – विदेश की हवा

अब तक हमने भारतीय इंडेक्स की बात की। लेकिन इंटरनेशनल इंडेक्स फंड्स भी उपलब्ध हैं। आप अमेरिका के एसएंडपी पांच सौ में निवेश कर सकते हैं। या नैस्डैक सौ में जिसमें टेक कंपनियां हैं।

मोहित सोच रहे थे कि क्या उन्हें इंटरनेशनल एक्सपोजर लेना चाहिए। आखिर एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी कंपनियां भारत में तो हैं नहीं। और अमेरिकी बाजार दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे स्थिर बाजार है।

यह सोच बिल्कुल सही है। लेकिन इंटरनेशनल इंडेक्स फंड्स में कुछ चीजें ध्यान रखनी होंगी। एक तो करेंसी रिस्क है। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है तो आपका रिटर्न कम हो जाएगा। दूसरा, इंटरनेशनल फंड्स का एक्सपेंस रेशियो थोड़ा ज्यादा होता है। तीसरा, टैक्सेशन भी अलग है।

फिर भी, अगर आप अपने पोर्टफोलियो का दस से पंद्रह प्रतिशत इंटरनेशनल में रखना चाहते हैं, तो यह अच्छा डाइवर्सिफिकेशन है। लेकिन ज्यादातर हिस्सा भारतीय इंडेक्स में ही रहना चाहिए क्योंकि आप भारत में रहते हैं, आपका खर्च रुपये में है, और भारत की ग्रोथ स्टोरी अभी बाकी है।

तो फाइनल फैसला क्या हो?

तीन महीने की रिसर्च के बाद नीरज ने अपना फैसला ले लिया। वे अपनी कुल बचत का पचास प्रतिशत निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में लगाएंगे। यह उनका कोर होल्डिंग होगी। बीस प्रतिशत निफ्टी नेक्स्ट पचास में लगाएंगे ताकि थोड़ी ग्रोथ पोटेंशियल मिले। दस प्रतिशत एसएंडपी पांच सौ इंडेक्स फंड में लगाएंगे इंटरनेशनल एक्सपोजर के लिए। और बाकी बीस प्रतिशत डेट फंड या एफडी में रखेंगे स्थिरता के लिए।

यह एक बैलेंस्ड पोर्टफोलियो है। ज्यादा कॉम्प्लेक्स नहीं – केवल तीन इंडेक्स फंड्स। लेकिन अच्छी विविधता है। लार्ज कैप, मिड कैप, और इंटरनेशनल – सब कवर है।

लेकिन याद रखिए, यह सिर्फ एक उदाहरण है। आपका पोर्टफोलियो आपकी उम्र, रिस्क लेने की क्षमता, और लक्ष्यों के हिसाब से होना चाहिए। अगर आप बहुत सिंपल रखना चाहते हैं तो सिर्फ एक निफ्टी पचास इंडेक्स फंड भी पूरी तरह ठीक है। बल्कि कई एक्सपर्ट्स यही सलाह देते हैं।

इंडेक्स चुनते समय क्या देखें?

जब आप किसी इंडेक्स को चुन रहे हों, तो कुछ बातें जरूर देख लें। पहली बात, उस इंडेक्स में कितनी कंपनियां हैं? पचास, सौ, या पांच सौ? ज्यादा कंपनियां मतलब ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन लेकिन थोड़ी ज्यादा कॉम्प्लेक्सिटी भी।

दूसरी बात, टॉप दस कंपनियों का कुल वेटेज क्या है? अगर साठ-सत्तर प्रतिशत है तो समझ लीजिए कि आपका ज्यादातर पैसा इन दस कंपनियों में ही है। यह अच्छा भी है और रिस्की भी।

तीसरी बात, सेक्टर का कंसंट्रेशन क्या है? अगर किसी एक सेक्टर का वेटेज चालीस-पचास प्रतिशत है तो वह सेक्टर आपके रिटर्न को बहुत प्रभावित करेगा। जैसे कि निफ्टी में फाइनेंशियल सर्विसेज का वेटेज तीस-पैंतीस प्रतिशत के आसपास रहता है।

चौथी बात, उस इंडेक्स का ऐतिहासिक परफॉर्मेंस क्या है? पिछले दस-पंद्रह साल में कैसा रहा? कितना वोलाटाइल रहा? सबसे बड़ी गिरावट कितनी आई और कितने समय में रिकवर हुआ?

और सबसे महत्वपूर्ण बात – क्या यह इंडेक्स आपकी समझ में आ रहा है? अगर कोई इंडेक्स बहुत कॉम्प्लेक्स लग रहा है तो उससे दूर रहिए। सिंपल चीजें ही लंबी अवधि में सबसे बेहतर काम करती हैं।

आम गलतियों से बचें

बहुत से नए निवेशक सोचते हैं कि अलग-अलग इंडेक्स फंड्स खरीदने से ज्यादा डाइवर्सिफिकेशन मिलेगी। तो वे निफ्टी पचास, निफ्टी सौ, और निफ्टी पांच सौ तीनों में निवेश कर देते हैं। लेकिन यह ज्यादातर ओवरलैप है। तीनों में लगभग एक ही कंपनियां हैं। तो आप सिर्फ कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ा रहे हैं।

दूसरी गलती – सेक्टोरल इंडेक्स में ज्यादा पैसा लगाना। देखा जाता है कि जब कोई सेक्टर बहुत अच्छा चल रहा होता है तो लोग उत्साह में आकर उसमें भारी निवेश कर देते हैं। फिर जब वह सेक्टर गिरता है तो भारी नुकसान होता है।

तीसरी गलती – हर नए इंडेक्स की तरफ भागना। आजकल बहुत से नए-नए इंडेक्स आ रहे हैं – मोमेंटम इंडेक्स, क्वालिटी इंडेक्स, लो वोलैटिलिटी इंडेक्स। ये सब अच्छे लगते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि बेहतर हों। पुराने और समय-परीक्षित इंडेक्स ही सबसे सुरक्षित हैं।

याद रखने योग्य बातें

भारत में सबसे प्रमुख इंडेक्स हैं निफ्टी पचास और सेंसेक्स। दोनों में ज्यादा फर्क नहीं है। निफ्टी पचास में पचास कंपनियां हैं तो थोड़ी ज्यादा विविधता है। ज्यादातर नए निवेशकों के लिए निफ्टी पचास परफेक्ट है।

अगर आप थोड़ी ज्यादा विविधता चाहते हैं तो निफ्टी सौ या निफ्टी पांच सौ भी अच्छे विकल्प हैं। लेकिन याद रखिए कि इनका परफॉर्मेंस भी निफ्टी पचास से बहुत अलग नहीं होता क्योंकि बड़ी कंपनियों का वेटेज हर इंडेक्स में ज्यादा होता है।

मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ज्यादा रिटर्न दे सकते हैं लेकिन ज्यादा रिस्की भी हैं। इनमें केवल तभी निवेश करें जब आप उतार-चढ़ाव को संभाल सकें। और अपने कुल पोर्टफोलियो का केवल एक छोटा हिस्सा ही इनमें रखें।

सेक्टोरल इंडेक्स से नए निवेशकों को दूर रहना चाहिए। ये बहुत रिस्की हैं और इनके लिए मार्केट की अच्छी समझ चाहिए। ब्रॉड मार्केट इंडेक्स हमेशा बेहतर विकल्प हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण – सिंपल रखिए। ज्यादातर लोगों के लिए एक या दो इंडेक्स फंड काफी हैं। जितना सिंपल होगा, उतना आसान होगा फॉलो करना और उतना ही बेहतर होगा आपका मानसिक स्वास्थ्य।

आगे की राह

अब जब आप जान गए हैं कि कौन-कौन से इंडेक्स हैं और कैसे चुनना है, अगला सवाल है – कैसे तुलना करें अलग-अलग इंडेक्स फंड्स की जो एक ही इंडेक्स को ट्रैक करते हैं?

अगले अध्याय में हम सीखेंगे कि अगर दस अलग-अलग फंड हाउसेस निफ्टी पचास इंडेक्स फंड ऑफर कर रहे हैं, तो कैसे तय करें कि कौन सा लेना है? किन पैरामीटर्स पर ध्यान देना है? ट्रैकिंग एरर क्या है? एक्सपेंस रेशियो कितना होना चाहिए? और भी बहुत कुछ।


याद रखें:

“सबसे बेहतरीन इंडेक्स वह नहीं जो सबसे ज्यादा रिटर्न देता है, बल्कि वह है जो आपकी समझ में आता है और जिसे आप लंबी अवधि तक होल्ड कर सकते हैं।”


अगला अध्याय: “इंडेक्स फंड बनाम एक्टिव म्यूचुअल फंड: सच्चाई क्या है?”# इंडेक्स फंड्स: आम निवेशक की संपूर्ण गाइड

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