अध्याय 9: SIP vs Lumpsum (in Hindi) – जानें आपके लिए क्या है सही ?

SIP vs Lumpsum: Index Funds Me Nivesh Ke Liye Kya Hai Sahi
SIP vs Lumpsum: Index Funds Me Nivesh Ke Liye Kya Hai Sahi

इंडेक्स फंड में  निवेश शुरू करते समय सबसे आम सवाल यही होता है—SIP करें या Lump Sum? कोई कहता है हर महीने थोड़ा-थोड़ा निवेश ज़्यादा सुरक्षित है, तो कोई एक साथ पैसा लगाने को बेहतर मानता है। लेकिन सच्चाई यह है कि सही तरीका आपकी आय, बाज़ार की स्थिति और आपके लक्ष्य पर निर्भर करता है। इस लेख में हम बिना किसी भारी शब्दावली के समझेंगे कि आपके लिए SIP सही है या Lump Sum, ताकि आप सोच-समझकर फैसला ले सकें।

राज की दुविधा – बोनस का पैसा कहाँ लगाएं?

राज को इस साल पांच लाख रुपये का बोनस मिला है। वे बहुत खुश हैं लेकिन साथ ही एक बड़े सवाल में फंसे हुए हैं। यह पैसा कैसे निवेश करें? उनके दोस्त अलग-अलग सलाह दे रहे हैं।

उनके सहकर्मी विकास ने कहा, “भाई, पूरा पैसा एक साथ लगा दो निफ्टी इंडेक्स फंड में। जितनी जल्दी पैसा बाजार में जाएगा, उतनी जल्दी कंपाउंडिंग शुरू होगी। समय बर्बाद मत करो।”

उनकी पत्नी प्रीति ने कहा, “नहीं-नहीं, एक साथ इतना पैसा लगाना रिस्की है। क्या पता कल बाजार गिर जाए। थोड़ा-थोड़ा करके लगाओ। हर महीने पचास हजार एसआईपी करो दस महीने तक।”

उनके पिताजी ने कहा, “बेटा, आधा अभी लगा दो, आधा छह महीने बाद। इससे बीच का रास्ता निकल जाएगा।”

राज पूरी तरह कन्फ्यूज हो गए। एकमुश्त लगाएं या एसआईपी करें? या कुछ मिक्स करें? कौन सा तरीका बेहतर रिटर्न देगा? किसमें कम रिस्क है?

अगर आप भी राज की तरह इस सवाल से जूझ रहे हैं – चाहे आपको बोनस मिला हो, एफडी मैच्योर हुई हो, या प्रॉपर्टी बेची हो – यह अध्याय आपके लिए है। आइए समझते हैं कि एसआईपी और एकमुश्त निवेश में क्या फर्क है और आपके लिए क्या सही है।

SIP क्या है – सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान की पूरी जानकारी

एसआईपी यानी सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान। इसमें आप हर महीने एक तय रकम म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। जैसे हजार रुपये, पांच हजार, दस हजार – जो भी आपका बजट हो। यह रकम हर महीने एक तय तारीख को आपके बैंक अकाउंट से ऑटोमैटिक कट जाती है और फंड में निवेश हो जाती है।

मान लीजिए आपने तय किया कि हर महीने की दस तारीख को पांच हजार रुपये निफ्टी फिफ्टी इंडेक्स फंड में एसआईपी करनी है। तो हर महीने दस तारीख को ऑटोमैटिक पांच हजार कट जाएंगे। जनवरी में भी, फरवरी में भी, हर महीने। आपको कुछ करना नहीं पड़ता।

एसआईपी की सबसे बड़ी खूबी है इसकी सरलता। एक बार सेटअप कर दो, बाकी सब ऑटोमैटिक। आपको यह सोचने की जरूरत नहीं कि बाजार ऊपर है या नीचे, अभी निवेश करूं या बाद में। बस हर महीने निवेश होता रहता है।

एकमुश्त निवेश क्या होता है – लम्पसम की समझ

एकमुश्त निवेश यानी लम्पसम में आप एक साथ बड़ी रकम निवेश करते हैं। जैसे राज के पास पांच लाख रुपये बोनस आया है। अगर वे पूरा पांच लाख एक दिन में निफ्टी इंडेक्स फंड में लगा दें, तो यह एकमुश्त निवेश होगा।

एकमुश्त निवेश आमतौर पर तब होता है जब आपके पास अचानक बड़ी रकम आती है। बोनस मिला, प्रॉपर्टी बेची, एफडी मैच्योर हुई, विरासत में पैसा आया, या कोई बड़ी बचत जमा हो गई।

इसमें सारा पैसा एक साथ, एक ही दिन बाजार में चला जाता है। उस दिन का जो भी एनएवी है, उस भाव पर आपको यूनिट्स मिल जाती हैं। फिर वे यूनिट्स बाजार के साथ ऊपर-नीचे होती रहती हैं।

रुपी कॉस्ट एवरेजिंग – SIP का सबसे बड़ा फायदा

एसआईपी का सबसे बड़ा फायदा है रुपी कॉस्ट एवरेजिंग। यह थोड़ा कठिन शब्द लगता है लेकिन समझना बहुत आसान है। आइए एक उदाहरण से समझते हैं।

मीना हर महीने दस हजार रुपये की एसआईपी करती हैं निफ्टी इंडेक्स फंड में। आइए देखते हैं छह महीने में क्या होता है:

जनवरी में एनएवी था सौ रुपये। मीना के दस हजार रुपये से उन्हें मिलीं सौ यूनिट्स। फरवरी में एनएवी गिरकर अस्सी रुपये हो गया। अब मीना के दस हजार से मिलीं एक सौ पच्चीस यूनिट्स। मार्च में एनएवी था नब्बे रुपये, मीना को मिलीं एक सौ ग्यारह यूनिट्स। अप्रैल में एनएवी एक सौ दस था, मिलीं इक्यानवे यूनिट्स। मई में एनएवी था एक सौ बीस, मिलीं तिरासी यूनिट्स। जून में एनएवी था एक सौ, फिर से सौ यूनिट्स मिलीं।

अब देखिए क्या हुआ। मीना ने कुल साठ हजार रुपये निवेश किए छह महीने में। उन्हें कुल मिलीं छह सौ दस यूनिट्स। उनकी औसत खरीद कीमत हुई अड़तालीस रुपये प्रति यूनिट (साठ हजार बांटा छह सौ दस)। और आखिरी एनएवी है सौ रुपये।

तो मीना की कुल वैल्यू हुई छह सौ दस गुना सौ यानी साठ एक हजार रुपये। एक हजार का फायदा। लेकिन असली बात यह है कि जब एनएवी अस्सी रुपये था तब मीना को ज्यादा यूनिट्स मिलीं। जब एनएवी एक सौ बीस था तब कम यूनिट्स मिलीं। यह है रुपी कॉस्ट एवरेजिंग। आप सस्ते में ज्यादा खरीदते हैं और महंगे में कम।

बाजार की टाइमिंग का झंझट नहीं – SIP से टेंशन फ्री निवेश

अमित के पास पांच लाख रुपये थे निवेश के लिए। लेकिन वे सोच में पड़ गए। अभी बाजार बहुत ऊपर है। निफ्टी अपने ऑल टाइम हाई के पास है। क्या अभी निवेश करना सही होगा? क्या थोड़ा इंतजार करूं कि बाजार गिरे तो सस्ते में खरीद लूं?

अमित तीन महीने इंतजार करते रहे। बाजार और ऊपर चला गया। फिर वे सोचने लगे – अब तो और महंगा हो गया। और इंतजार करता हूं। छह महीने हो गए, बाजार और बढ़ा। आखिरकार नौ महीने बाद अमित ने निवेश किया। तब तक बाजार पंद्रह प्रतिशत और ऊपर जा चुका था।

अगर अमित ने नौ महीने पहले एसआईपी शुरू कर दी होती हर महीने पचपन हजार की, तो उनका औसत कॉस्ट बहुत बेहतर होता। और वे नौ महीने की बाजार की बढ़त को भी पकड़ लेते।

यह है एसआईपी की खूबी। आपको बाजार की टाइमिंग देखने की जरूरत नहीं। आप हर महीने निवेश करते रहते हैं। कभी बाजार ऊपर होगा, कभी नीचे। लेकिन लंबी अवधि में यह औसत हो जाता है।

मार्केट ऊपर हो या नीचे – SIP कब शुरू करें?

सबसे आम सवाल जो लोग पूछते हैं – “अभी बाजार बहुत ऊपर है। क्या अभी एसआईपी शुरू करना सही होगा? क्या गिरावट का इंतजार करूं?”

इसका सीधा जवाब है – बाजार हमेशा किसी ने किसी को ऊपर ही लगता है। अगर आप पीछे मुड़कर देखें, तो दस साल पहले का बाजार आज से बहुत नीचे था। उस समय भी लोग कहते थे कि बाजार ऊपर है। लेकिन आज की तुलना में वह बहुत नीचे था।

नेहा की कहानी सुनिए। दो हजार सत्रह में उन्होंने सोचा कि एसआईपी शुरू करें। लेकिन उस समय निफ्टी दस हजार के पास था और सबने कहा कि यह बहुत ऊपर है। नेहा ने इंतजार किया। दो साल इंतजार करते-करते निफ्टी बारह हजार पहुंच गया। तब नेहा को एहसास हुआ कि दो साल बर्बाद हो गए।

आखिरकार दो हजार उन्नीस में उन्होंने एसआईपी शुरू की। और अच्छा ही हुआ। क्योंकि अगर वे दो हजार सत्रह में ही शुरू कर देतीं, तो उन्हें दो साल का अतिरिक्त रिटर्न मिल गया होता।

तो जवाब है – एसआईपी आज ही शुरू कर दीजिए। बाजार ऊपर है या नीचे, यह मत देखिए। जितनी जल्दी शुरू करेंगे, उतना अच्छा।

लम्पसम कब बेहतर है – एकमुश्त निवेश की स्थिति

अब सवाल यह है कि क्या एकमुश्त निवेश कभी बेहतर होता है? जवाब है – हां, कुछ स्थितियों में एकमुश्त निवेश बेहतर साबित होता है।

पहली स्थिति – जब बाजार में बड़ी गिरावट आई हो। मार्च दो हजार बीस में कोविड के समय बाजार चालीस प्रतिशत गिर गया था। अगर उस समय आपके पास पैसा था और आपने एकमुश्त निवेश किया, तो अगले दो साल में शानदार रिटर्न मिला। ऐसे समय में एकमुश्त निवेश एसआईपी से बेहतर होता है।

लेकिन समस्या यह है कि गिरावट के समय सबको डर लगता है। मार्च दो हजार बीस में किसी को नहीं पता था कि आगे क्या होगा। सब डरे हुए थे। ऐसे में एकमुश्त निवेश करने का साहस बहुत कम लोगों में होता है।

दूसरी स्थिति – जब आपका निवेश लंबी अवधि के लिए है। मान लीजिए आपके पास पांच लाख रुपये हैं और आपको यह पैसा अगले बीस साल तक नहीं चाहिए। तो स्टैटिस्टिकली एकमुश्त निवेश एसआईपी से थोड़ा बेहतर रिटर्न देता है। क्योंकि आपका पूरा पैसा पहले दिन से ही कंपाउंडिंग करने लगता है।

लेकिन यहां भी एक चैलेंज है। अगर आपने एकमुश्त लगाया और अगले दिन बाजार बीस प्रतिशत गिर गया, तो क्या आप घबराएंगे नहीं? क्या बेचने का मन नहीं करेगा?

भावनात्मक पहलू – दिल और दिमाग की लड़ाई

सुनील के पास दस लाख रुपये थे। उन्होंने पूरे दस लाख एक साथ निफ्टी इंडेक्स फंड में लगा दिए। यह उनकी पूरी जिंदगी की बचत थी। अगले दिन से बाजार में कुछ गिरावट शुरू हुई। एक हफ्ते में पांच प्रतिशत गिरा। सुनील के दस लाख नौ लाख पचास हजार हो गए। पचास हजार का नुकसान।

सुनील की रातों की नींद उड़ गई। वे दिन में दस बार अपना फंड चेक करने लगे। पत्नी से झगड़े होने लगे। दफ्तर में ध्यान नहीं लग रहा था। दो हफ्ते में जब गिरावट दस प्रतिशत हो गई, तो सुनील ने नुकसान में ही बेच दिया। उन्हें लगा कि और गिरेगा तो और नुकसान होगा।

लेकिन क्या हुआ? तीन महीने बाद बाजार रिकवर कर गया और पहले से भी ऊपर चला गया। अगर सुनील ने होल्ड किया होता, तो उन्हें मुनाफा होता। लेकिन भावनाओं ने उन्हें गलत फैसला लेने पर मजबूर किया।

अब प्रमोद की कहानी देखिए। उनके पास भी दस लाख रुपये थे। लेकिन उन्होंने एसआईपी शुरू की बीस हजार रुपये महीने की। पचास महीने चलनी थी। जब बाजार गिरा, तो प्रमोद को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। उनका तो केवल बीस हजार ही लगा था अभी। बाकी पैसा सुरक्षित था। और उन्हें पता था कि अगले महीने फिर बीस हजार लगेगा सस्ते भाव में।

यह है भावनात्मक अंतर। एकमुश्त में पूरा पैसा एक साथ रिस्क में है। एसआईपी में थोड़ा-थोड़ा रिस्क में जाता है। इसलिए मानसिक रूप से एसआईपी ज्यादा आरामदायक है।

स्टैगर्ड एंट्री – बीच का रास्ता

राज के पिताजी ने जो सुझाव दिया था वह भी बुरा नहीं है। आधा अभी लगाओ, आधा बाद में। इसे कहते हैं स्टैगर्ड एंट्री या स्टेप-बाई-स्टेप निवेश।

मान लीजिए आपके पास पांच लाख रुपये हैं। आप पूरा एकमुश्त लगाने से डर रहे हैं क्योंकि बाजार ऊपर लग रहा है। और महीने-महीने एसआईपी करना भी सही नहीं लग रहा क्योंकि पूरे पैसे को काम पर लगने में बहुत समय लग जाएगा।

तो आप ऐसा कर सकते हैं – पहले महीने एक लाख लगाओ। दूसरे महीने एक लाख। तीसरे महीने एक लाख। चौथे महीने एक लाख। पांचवें महीने एक लाख। पांच महीने में सारा पैसा काम पर लग गया।

यह एसआईपी से तेज है क्योंकि हर महीने ज्यादा पैसा जा रहा है। और एकमुश्त से सुरक्षित है क्योंकि पूरा पैसा एक साथ नहीं गया। यह बीच का रास्ता है।

बहुत से फाइनेंशियल एडवाइजर इसे सिस्टेमैटिक ट्रांसफर प्लान यानी एसटीपी के नाम से भी बताते हैं। आप पूरा पैसा लिक्विड फंड में रख देते हैं। फिर हर महीने एक तय रकम लिक्विड फंड से इक्विटी इंडेक्स फंड में ट्रांसफर होती रहती है।

डेटा क्या कहता है – सांख्यिकी की सच्चाई

अब आते हैं आंकड़ों पर। क्या डेटा कहता है? लंबी अवधि में कौन बेहतर है – एसआईपी या एकमुश्त?

एक स्टडी के अनुसार, अगर आप किसी भी रैंडम दिन एकमुश्त निवेश करें और पंद्रह साल होल्ड करें, तो औसतन एकमुश्त निवेश एसआईपी से डेढ़ से दो प्रतिशत ज्यादा रिटर्न देता है।

क्यों? क्योंकि आपका पूरा पैसा पहले दिन से काम कर रहा है। कंपाउंडिंग ज्यादा समय के लिए हो रही है। जबकि एसआईपी में आपका पूरा पैसा धीरे-धीरे बाजार में जाता है। आखिरी किस्त तो बहुत बाद में जाती है।

लेकिन यहां बड़ी कैच है। यह औसत है। कुछ मामलों में एकमुश्त बहुत अच्छा करता है, कुछ में बहुत खराब। अगर आपने गलत समय में एकमुश्त लगा दिया – जैसे जनवरी दो हजार आठ में जब बाजार टॉप पर था – तो आपको पांच-सात साल तक नुकसान में रहना पड़ा।

एसआईपी ज्यादा कंसिस्टेंट है। चाहे आपने कभी भी शुरू किया हो, दस-पंद्रह साल में लगभग सभी मामलों में अच्छा रिटर्न मिला है। उतार-चढ़ाव कम है।

तो सवाल यह नहीं कि कौन बेहतर है। सवाल यह है कि आपके लिए क्या सही है।

आपकी स्थिति के हिसाब से फैसला – व्यक्तिगत परिस्थितियां

चलिए अलग-अलग स्थितियां देखते हैं और हर स्थिति में क्या सही है।

स्थिति एक – नौकरीपेशा, नियमित सैलरी

अगर आप नौकरीपेशा हैं और हर महीने सैलरी आती है, तो एसआईपी परफेक्ट है। हर महीने सैलरी आई, एसआईपी कट गई। यह आपके कैश फ्लो के साथ मैच करता है। और आपको एक बड़ी रकम इकट्ठा करके रखने की जरूरत नहीं।

स्थिति दो – बोनस या बड़ी रकम मिली

अगर आपको अचानक बड़ी रकम मिली है – बोनस, एफडी मैच्योर, प्रॉपर्टी बेची – तो स्टैगर्ड एंट्री अच्छा आप्शन है। पूरा पैसा एक साथ मत लगाइए। तीन-छह महीने में बांटकर लगाइए। यह आपको भावनात्मक रूप से सहज रखेगा।

स्थिति तीन – रिटायरमेंट का कॉर्पस

अगर आपने रिटायर होते समय पीएफ से बड़ी रकम निकाली है और उसे निवेश करना है, तो बहुत सावधानी बरतिए। पूरा पैसा इक्विटी में एकमुश्त मत लगाइए। एक हिस्सा डेट में रखिए। और इक्विटी वाले हिस्से को स्टैगर्ड एंट्री से लगाइए कम से कम एक-दो साल में।

स्थिति चार – बहुत कम उम्र, लंबा समय

अगर आप बहुत युवा हैं – पच्चीस-तीस साल के – और आपको पैसा अगले बीस-पच्चीस साल तक नहीं चाहिए, तो एकमुश्त भी चल सकता है। क्योंकि आपके पास रिकवर करने का पर्याप्त समय है। लेकिन फिर भी, अगर आप भावनात्मक रूप से मजबूत नहीं हैं, तो एसआईपी बेहतर है।

बोनस मिलने पर क्या करें – प्रैक्टिकल स्ट्रैटेजी

राज की समस्या पर वापस आते हैं। उनके पास पांच लाख रुपये बोनस है। उन्हें क्या करना चाहिए?

एक समझदारी भरी स्ट्रैटेजी यह हो सकती है:

पहला, एक लाख रुपये इमरजेंसी फंड में रखें। लिक्विड फंड या सेविंग अकाउंट में। यह किसी इमरजेंसी के लिए है।

दूसरा, एक लाख रुपये एकमुश्त निफ्टी इंडेक्स फंड में लगा दें। यह आपकी लम्पसम एंट्री है।

तीसरा, बाकी तीन लाख रुपये से शुरू करें पच्चीस हजार रुपये महीने की एसआईपी। यह बारह महीने चलेगी।

इस तरह आपने तीन चीजें कीं – इमरजेंसी फंड बनाया, कुछ पैसा तुरंत काम पर लगाया, और बाकी को स्टैगर्ड तरीके से निवेश करने का प्लान बनाया। यह बैलेंस्ड अप्रोच है।

SIP कितने साल तक चलानी चाहिए – समय अवधि का सवाल

कई लोग पूछते हैं – एसआईपी कितने साल चलानी चाहिए? एक साल? पांच साल? दस साल? या हमेशा?

जवाब निर्भर करता है आपके गोल पर। अगर आपका गोल है दस साल बाद घर का डाउन पेमेंट, तो कम से कम आठ-नौ साल तक एसआईपी चलाइए। आखिरी एक-दो साल में धीरे-धीरे पैसा निकालना शुरू कर दीजिए और डेट फंड में शिफ्ट कीजिए।

अगर आपका गोल है रिटायरमेंट जो बीस साल दूर है, तो बीस साल तक एसआईपी चलाइए। और अच्छा तो यह होगा कि हर साल अपनी एसआईपी रकम दस-पंद्रह प्रतिशत बढ़ाते जाइए जैसे-जैसे आपकी सैलरी बढ़ती है।

लेकिन सबसे अच्छा है अगर आप एसआईपी को एक लाइफस्टाइल बना लें। जब तक आप कमा रहे हैं, एसआईपी चलती रहनी चाहिए। भले ही आपने अपना पहला गोल अचीव कर लिया हो, अगला गोल के लिए एसआईपी जारी रखिए। यह वेल्थ क्रिएशन का सबसे आसान तरीका है।

मार्केट गिरने पर SIP बंद करें या जारी रखें?

सबसे बड़ी गलती जो लोग करते हैं वह है बाजार गिरने पर एसआईपी बंद कर देना। मार्च दो हजार बीस में जब कोविड आया और बाजार चालीस प्रतिशत गिरा, तो लाखों लोगों ने अपनी एसआईपी बंद कर दी। उन्हें लगा कि और गिरेगा, पैसा डूब जाएगा।

लेकिन जो लोग समझदार थे, उन्होंने एसआईपी जारी रखी। बल्कि कुछ ने तो एसआईपी की रकम बढ़ा दी। और क्या हुआ? अगले दो साल में बाजार ने शानदार रिकवरी की। जिन्होंने गिरावट में एसआईपी जारी रखी, उन्हें सबसे बेहतरीन रिटर्न मिला।

समझिए ऐसे – जब आपकी पसंदीदा शर्ट की कीमत पचास प्रतिशत कम हो जाए, तो आप खुश होते हैं या दुखी? खुश होते हैं ना, क्योंकि आप सस्ते में खरीद सकते हैं। तो फिर जब शेयर बाजार सस्ता हो जाता है, तो घबराते क्यों हैं?

बाजार गिरना एसआईपी निवेशकों के लिए सेल का मौका है। आपको ज्यादा यूनिट्स मिलती हैं उसी पैसे में। इसलिए बाजार गिरे तो एसआईपी बंद मत कीजिए। बल्कि अगर हो सके तो बढ़ा दीजिए।

SIP में पैसा कब बढ़ाएं – स्टेप-अप की रणनीति

राहुल ने पांच साल पहले पांच हजार रुपये महीने की एसआईपी शुरू की थी। आज भी वे पांच हजार ही कर रहे हैं। इन पांच सालों में उनकी सैलरी पच्चीस हजार से बढ़कर पचास हजार हो गई। दुगनी हो गई। लेकिन एसआईपी वही पांच हजार।

यह बहुत बड़ी गलती है। जैसे-जैसे आपकी आमदनी बढ़ती है, वैसे-वैसे आपकी एसआईपी भी बढ़नी चाहिए। आदर्श स्थिति में हर साल दस से पंद्रह प्रतिशत एसआईपी बढ़ानी चाहिए।

राहुल अगर हर साल दस प्रतिशत एसआईपी बढ़ाते, तो आज उनकी एसआईपी होती लगभग आठ हजार रुपये महीने। और उनका कुल कॉर्पस होता बहुत ज्यादा।

कुछ फंड हाउसेस स्टेप-अप एसआईपी की सुविधा देते हैं। इसमें आप पहले से ही सेट कर सकते हैं कि हर साल आपकी एसआईपी दस प्रतिशत या कोई भी फिक्स्ड परसेंटेज बढ़ जाएगी। यह बहुत अच्छी सुविधा है। अगर आपका फंड हाउस यह देता है, तो जरूर इस्तेमाल कीजिए।

लम्पसम निवेश के बाद SIP भी जारी रखें

एक और गलतफहमी है कि अगर आपने एकमुश्त निवेश कर दिया तो एसआईपी की जरूरत नहीं। यह गलत है। दोनों एक साथ चल सकते हैं।

मनीष को दस लाख रुपये बोनस मिला। उन्होंने पूरा दस लाख निफ्टी इंडेक्स फंड में एकमुश्त लगा दिया। लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि अब तो पैसा लग गया, अब और निवेश की क्या जरूरत। उनकी महीने की पांच हजार की एसआईपी भी बंद कर दी।

यह बहुत बड़ी गलती थी। वह दस लाख तो एक बार का था। लेकिन हर महीने की सैलरी से बचत तो हो ही रही थी। वह पैसा कहां जा रहा था? खर्च हो रहा था। अगर मनीष ने एसआईपी जारी रखी होती, तो उनकी वेल्थ और तेजी से बढ़ती।

समझिए ऐसे – एकमुश्त निवेश एक बड़ा बूस्टर है। लेकिन एसआईपी रेगुलर इंजन है। दोनों मिलकर आपकी वेल्थ को आगे ले जाते हैं। एक को बंद मत कीजिए दूसरे की वजह से।

इमरजेंसी में SIP का पैसा निकालें या नहीं?

अंकित को अचानक दो लाख रुपये की जरूरत पड़ गई। उनकी माँ को ऑपरेशन करवाना था। अंकित के पास दो ऑप्शन थे – या तो बैंक से लोन लें या फिर अपनी इंडेक्स फंड एसआईपी से पैसा निकालें।

अंकित ने अपनी एसआईपी देखी। तीन साल से चल रही थी। कुल साढ़े चार लाख रुपये निवेश किए थे और अब वैल्यू थी छह लाख। अच्छा रिटर्न था। उन्होंने दो लाख निकाल लिए।

क्या यह सही फैसला था? हां, बिल्कुल। इमरजेंसी के लिए ही तो आप निवेश करते हैं। अगर सच में जरूरत है, तो बेझिझक निकालिए। लोन लेकर ब्याज देने से बेहतर है अपना ही पैसा इस्तेमाल करना।

लेकिन दो बातें ध्यान रखिए। एक, पूरा पैसा मत निकालिए। अंकित ने दो लाख निकाले, चार लाख रहने दिए। तो उनकी एसआईपी का बेस बना रहा। दो, जैसे ही स्थिति सुधरे, एसआईपी की रकम बढ़ा दीजिए ताकि जो पैसा निकाला वह फिर से भर जाए।

और सबसे जरूरी – इमरजेंसी फंड अलग से रखिए। तीन-छह महीने का खर्च लिक्विड फंड या सेविंग अकाउंट में हमेशा रखिए। तभी आपकी लंबी अवधि की एसआईपी को छूना नहीं पड़ेगा।

कितने इंडेक्स फंड में SIP करें – विविधीकरण का सवाल

प्रवीण ने सोचा कि अगर एक इंडेक्स फंड में एसआईपी अच्छी है, तो पांच इंडेक्स फंड्स में और भी अच्छी होगी। उन्होंने शुरू कीं – निफ्टी फिफ्टी में, निफ्टी नेक्स्ट फिफ्टी में, निफ्टी मिडकैप में, निफ्टी स्मॉलकैप में, और यूएस इंडेक्स में। पांच अलग-अलग एसआईपी।

एक साल बाद प्रवीण परेशान हो गए। हर महीने पांच अलग-अलग डेबिट। हर फंड को ट्रैक करना। कौन सा कैसा चल रहा है यह देखना। बहुत कॉम्प्लेक्स हो गया।

सच यह है कि ज्यादातर लोगों के लिए एक या दो इंडेक्स फंड काफी हैं। अगर आप शुरुआत कर रहे हैं, तो सिर्फ निफ्टी फिफ्टी इंडेक्स फंड में एसआईपी काफी है। जब आपका कॉर्पस बड़ा हो जाए – पांच-दस लाख – तब आप सोच सकते हैं कि थोड़ा पैसा मिडकैप या इंटरनेशनल इंडेक्स में भी लगाएं।

लेकिन शुरुआत सिंपल रखिए। एक अच्छा इंडेक्स फंड चुनिए और उसमें नियमित एसआईपी कीजिए। कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ाने से फायदा नहीं, नुकसान ही होता है।

SIP कैसे शुरू करें – स्टेप बाय स्टेप गाइड

अब प्रैक्टिकल बात करते हैं। एसआईपी कैसे शुरू करें? बहुत आसान है।

पहला कदम – केवाईसी कंप्लीट कीजिए। यह एक बार की प्रक्रिया है। आप किसी भी म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म पर जाइए – ग्रो, कुवेरा, पेटीएम मनी, कोई भी। या सीधे फंड हाउस की वेबसाइट पर। अपना पैन कार्ड, आधार कार्ड देकर केवाईसी करवाइए। दस मिनट का काम है।

दूसरा कदम – अपना बैंक अकाउंट लिंक कीजिए। इससे ऑटो-डेबिट की सुविधा मिलेगी।

तीसरा कदम – इंडेक्स फंड चुनिए। निफ्टी फिफ्टी इंडेक्स फंड में से कोई अच्छा फंड चुनिए। देखिए कि एक्सपेंस रेशियो कम हो और ट्रैकिंग एरर भी कम हो।

चौथा कदम – एसआईपी रकम तय कीजिए। वही रकम चुनिए जो आप आराम से हर महीने दे सकें। पांच सौ रुपये से शुरू कर सकते हैं। दो हजार, पांच हजार – जो भी आपका बजट हो।

पांचवां कदम – एसआईपी की तारीख चुनिए। आमतौर पर सैलरी आने के दो-तीन दिन बाद की तारीख चुनिए। जैसे अगर आपकी सैलरी पहली तारीख को आती है, तो एसआईपी तीसरी या पांचवीं तारीख को रखिए।

छठा कदम – मैंडेट सेटअप कीजिए। यह ऑटो-डेबिट की इजाजत है। आपके बैंक को एक लिंक आएगा, उसे अप्रूव कर दीजिए।

बस हो गया। पहली एसआईपी शुरू हो जाएगी अगले महीने से। फिर हर महीने ऑटोमैटिक चलती रहेगी।

आम गलतियों से बचें – क्या न करें

पहली गलती – बहुत कम रकम से शुरू करके भूल जाना। लोग सोचते हैं कि पांच सौ रुपये महीने से शुरू करेंगे। ठीक है शुरुआत के लिए। लेकिन फिर वे इसे कभी बढ़ाते नहीं। पांच साल बाद भी पांच सौ ही चल रहा है। यह गलत है। हर साल बढ़ाते रहिए।

दूसरी गलती – बाजार के हिसाब से एसआईपी ऑन-ऑफ करना। बाजार ऊपर है तो बंद कर दिया। बाजार नीचे है तो फिर शुरू किया। यह मार्केट टाइमिंग है जो नहीं करनी चाहिए। एसआईपी का पूरा फायदा तभी मिलता है जब आप नियमित रूप से बिना रुके करते रहें।

तीसरी गलती – हर साल फंड बदलना। किसी फंड ने एक साल खराब किया तो उसे छोड़कर दूसरा ले लिया। फिर उसने खराब किया तो तीसरा। यह म्यूचुअल फंड हॉपिंग है। इंडेक्स फंड में तो यह बिल्कुल बेकार है क्योंकि सब निफ्टी को ही फॉलो करते हैं।

चौथी गलती – छोटे-छोटे लक्ष्यों के लिए एसआईपी रोकना। बेटे की फीस के लिए रोक दी। घर के रेनोवेशन के लिए रोक दी। ऐसे छोटे खर्चों के लिए एसआईपी मत रोकिए। अलग से पैसा रखिए। एसआईपी लंबी अवधि के बड़े लक्ष्यों के लिए है।

पांचवीं गलती – रिटर्न की रोज चेकिंग। कुछ लोग रोज अपना फंड चेक करते हैं। आज कितना बढ़ा, कितना घटा। यह सिर्फ टेंशन बढ़ाता है। एसआईपी साल में एक-दो बार चेक करना काफी है।

राज का फाइनल फैसला

तो राज ने आखिरकार क्या फैसला लिया? उन्होंने बैलेंस्ड अप्रोच अपनाया। पांच लाख में से एक लाख उन्होंने लिक्विड फंड में रखा इमरजेंसी के लिए। डेढ़ लाख एकमुश्त निफ्टी फिफ्टी इंडेक्स फंड में लगा दिया। और बाकी ढाई लाख से शुरू की पच्चीस हजार महीने की एसआईपी जो दस महीने चलनी थी।

साथ ही उन्होंने अपनी मौजूदा तीन हजार महीने की एसआईपी भी जारी रखी। तो अगले दस महीने उनकी कुल एसआईपी है अट्ठाईस हजार रुपये। और दस महीने बाद जब बोनस वाला पैसा खत्म हो जाएगा, तब वे अपनी रेगुलर एसआईपी पांच हजार कर देंगे।

यह एक समझदारी भरा फैसला है। राज ने इमरजेंसी फंड बनाया, कुछ पैसा तुरंत काम पर लगाया, बाकी को स्टैगर्ड तरीके से निवेश कर रहे हैं, और अपनी रेगुलर एसआईपी भी जारी रखी।

याद रखने योग्य मुख्य बातें

एसआईपी और एकमुश्त निवेश दोनों के अपने फायदे हैं। एसआईपी भावनात्मक रूप से ज्यादा आरामदायक है और मार्केट टाइमिंग की चिंता नहीं रहती। एकमुश्त स्टैटिस्टिकली थोड़ा बेहतर रिटर्न देता है लंबी अवधि में, लेकिन इसमें टाइमिंग का रिस्क है।

ज्यादातर लोगों के लिए एसआईपी बेहतर विकल्प है। यह आपकी सैलरी के कैश फ्लो से मैच करता है। रुपी कॉस्ट एवरेजिंग का फायदा मिलता है। और मानसिक रूप से सहज रहते हैं।

अगर आपके पास बड़ी रकम है तो स्टैगर्ड एंट्री अच्छा तरीका है। पूरा पैसा एक साथ मत लगाइए। तीन-छह महीने में बांटकर लगाइए।

सबसे जरूरी – एक बार एसआईपी शुरू करने के बाद उसे जारी रखिए। बाजार ऊपर हो या नीचे, चलने दीजिए। हर साल एसआईपी की रकम बढ़ाइए। और लंबी अवधि के लिए होल्ड कीजिए। यही है वेल्थ क्रिएशन का सबसे आसान और असरदार तरीका।

अगले अध्याय की झलक

अब जब आपने तय कर लिया है कि इंडेक्स फंड में निवेश करना है और एसआईपी या एकमुश्त का भी फैसला कर लिया है, तो अगला बड़ा सवाल है – कौन सा इंडेक्स फंड चुनें?

बाजार में बीस-पच्चीस अलग-अलग फंड हाउसेस निफ्टी फिफ्टी इंडेक्स फंड ऑफर करते हैं। सब एक ही इंडेक्स को ट्रैक करते हैं। फिर कैसे तय करें कि कौन सा लें? क्या सब एक जैसे हैं? किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए?

अगले अध्याय में हम सीखेंगे कि सबसे अच्छा इंडेक्स फंड कैसे चुनें। एक्सपेंस रेशियो क्या है? ट्रैकिंग एरर क्यों महत्वपूर्ण है? फंड साइज का क्या महत्व है? और भी बहुत कुछ।


याद रखें:

“निवेश में सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह नहीं है कि कब शुरू करें, बल्कि यह है कि शुरू करें। आज ही।”


अगला अध्याय: “सबसे अच्छा इंडेक्स फंड कैसे चुनें – व्यावहारिक गाइड”

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