अध्याय 5: इंडेक्स फंड बनाम फिक्स्ड डिपॉजिट: जोखिम, रिटर्न और सुरक्षा – पूरी सच्चाई एक लेख में | Index Funds vs FD in Hindi

Index Funds vs FD in Hindi
Index Funds vs Fixed Deposits

आज जब भी बचत की बात होती है, ज़्यादातर लोग बिना सोचे-समझे Fixed Deposit चुन लेते हैं। वहीं कुछ लोग Index Funds की तेज़ ग्रोथ की कहानियाँ सुनकर उलझन में पड़ जाते हैं। सवाल सिर्फ़ रिटर्न का नहीं है—सवाल यह है कि आपका पैसा आने वाले सालों में आपके लिए कितना मज़बूती से काम करेगा। इस लेख में हम बिना किसी जटिल भाषा के समझेंगे कि Index Funds और Fixed Deposit में असली फर्क क्या है, और आपके लिए कौन सा विकल्प ज़्यादा समझदारी भरा हो सकता है

इंडेक्स फंड्स और एफडी का डिबेट  | Index Funds vs FD 

रमा आंटी पचपन साल की हैं। पिछले तीस साल से वे फिक्स्ड डिपॉजिट में ही पैसा रखती आई हैं। उनके पिताजी ने उन्हें बचपन से यही सिखाया था – बैंक में रखो, फिक्स्ड डिपॉजिट करो, पक्का ब्याज मिलेगा। शेयर बाजार तो जुआ है।

जब उनकी बेटी प्रिया ने उन्हें इंडेक्स फंड के बारे में बताया, तो रमा आंटी ने सिर हिला दिया। “बेटा, तुम्हारी जनरेशन को इन सब चीजों में विश्वास है। लेकिन मैं तो वही करूंगी जो मेरे बाबूजी ने सिखाया। फिक्स्ड डिपॉजिट में सात परसेंट तो पक्का मिल रहा है। शेयर बाजार में आज दस परसेंट ऊपर, कल बीस परसेंट नीचे। मुझे यह रोलर कोस्टर नहीं चाहिए।”

प्रिया ने समझाने की कोशिश की। “मम्मी, लेकिन महंगाई का क्या? आपके पैसे की असली वैल्यू तो कम हो रही है।”

रमा आंटी ने जवाब दिया, “कम से कम मेरा पैसा तो सुरक्षित है। पूरा का पूरा वापस मिलेगा। शेयर बाजार में तो सब डूब सकता है।”

यह बातचीत लाखों भारतीय घरों में होती है। एक पीढ़ी जो फिक्स्ड डिपॉजिट पर पूरा भरोसा करती है। और नई पीढ़ी जो इंडेक्स फंड्स और इक्विटी की तरफ झुक रही है। आइए निष्पक्ष रूप से दोनों की तुलना करते हैं और देखते हैं कि किसकी बात में कितना दम है।

फिक्स्ड डिपॉजिट की सच्चाई

पहले समझते हैं कि फिक्स्ड डिपॉजिट क्या है और यह इतना लोकप्रिय क्यों है। जब आप बैंक में एफडी करवाते हैं, तो आप बैंक को एक निश्चित अवधि के लिए पैसा देते हैं। बैंक आपको एक निश्चित ब्याज दर देता है। मान लीजिए आपने एक लाख रुपये साढ़े छह प्रतिशत की दर से पांच साल के लिए एफडी में रखे। पांच साल बाद आपको एक लाख सैंतीस हजार रुपये मिलेंगे।

एफडी की सबसे बड़ी खासियत है निश्चितता। आपको पहले दिन से ही पता है कि मैच्योरिटी पर कितना मिलेगा। कोई सरप्राइज नहीं, कोई उतार-चढ़ाव नहीं। और सबसे बड़ी बात, पूरा पैसा सुरक्षित है। बैंक डूब भी जाए तो डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन आपके पांच लाख रुपये तक की एफडी की गारंटी देता है।

यही वजह है कि हमारे माता-पिता और दादा-दादी की पीढ़ी एफडी को इतना पसंद करती है। यह सुरक्षित है, समझने में आसान है, और कोई टेंशन नहीं। बस बैंक में जाओ, एफडी करवाओ, और भूल जाओ। पांच साल बाद जाकर पैसा निकाल लो।

लेकिन महंगाई का गणित बदल देता है तस्वीर

अब आते हैं उस बात पर जो रमा आंटी नजरअंदाज कर रही हैं – महंगाई। मान लीजिए आज एक लाख रुपये में आप जितना सामान खरीद सकते हैं, वह दस साल बाद दो लाख रुपये का होगा अगर महंगाई सालाना सात प्रतिशत रहे। यह है महंगाई की ताकत। धीरे-धीरे, चुपचाप, यह आपके पैसे की वैल्यू खाती जाती है।

अब देखिए क्या होता है। आपने एक लाख रुपये एफडी में रखे साढ़े छह प्रतिशत की दर से। दस साल बाद आपको मिलेगा लगभग एक लाख नब्बे हजार रुपये। आपको लगेगा कि अच्छा रिटर्न मिला। नब्बे हजार का फायदा। लेकिन असली तस्वीर कुछ और है।

महंगाई ने आपके पैसे की क्रय शक्ति कम कर दी है। जो सामान आज एक लाख में मिल रहा है, वह दस साल बाद दो लाख का होगा। तो आपके एक लाख नब्बे हजार रुपये की असली वैल्यू आज के पैंचानबे हजार रुपये जितनी है। मतलब आपने दस साल तक पैसा लगाया, ब्याज मिला, लेकिन फिर भी आपकी असली क्रय शक्ति घट गई।

यह है रियल रिटर्न का खेल। नॉमिनल रिटर्न यानी जो आंकड़ा कागज पर दिख रहा है वह साढ़े छह प्रतिशत है। लेकिन रियल रिटर्न यानी महंगाई घटाने के बाद जो बचता है, वह माइनस दशमलव पांच प्रतिशत है। आपका पैसा बढ़ा नहीं, घटा।

टैक्स का एक और झटका

अब एक और झटका देखिए जो ज्यादातर लोग नजरअंदाज करते हैं। एफडी पर जो ब्याज मिलता है, वह पूरी तरह टैक्सेबल है। और यह आपकी सैलरी में जुड़कर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है।

अगर आप तीस प्रतिशत टैक्स ब्रैकेट में हैं, तो साढ़े छह प्रतिशत ब्याज में से लगभग दो प्रतिशत टैक्स में चला जाएगा। बचेगा साढ़े चार प्रतिशत। और महंगाई है सात प्रतिशत। तो आपका रियल रिटर्न टैक्स के बाद है माइनस ढाई प्रतिशत। मतलब आप हर साल अपने पैसे की ढाई प्रतिशत वैल्यू खो रहे हैं।

बैंक का ब्याज स्लिप देखकर आपको लगता है कि आपको अच्छा रिटर्न मिल रहा है। लेकिन असली गणित टैक्स और महंगाई को ध्यान में रखने पर बिल्कुल उलट हो जाती है।

विजय अंकल की असली कहानी

विजय अंकल की कहानी सुनिए। उन्होंने बीस साल पहले दस लाख रुपये एफडी में रखे थे। उस समय उन्हें नौ प्रतिशत ब्याज मिल रहा था जो उस जमाने में अच्छा था। हर पांच साल में वे एफडी को रिन्यू करवाते रहे। आज उनके पास बयालीस लाख रुपये हैं। वे बहुत खुश हैं कि उनका पैसा चार गुना से ज्यादा हो गया।

लेकिन अगर महंगाई-समायोजित गणना करें, तो तस्वीर बदल जाती है। बीस साल पहले जिस चीज की कीमत एक लाख रुपये थी, आज उसकी कीमत लगभग चार लाख रुपये है। तो आज के बयालीस लाख रुपये की क्रय शक्ति उतनी ही है जितनी बीस साल पहले साढ़े दस लाख रुपये की थी। यानी सिर्फ पांच प्रतिशत की वृद्धि, वह भी बीस साल में। सालाना चौथाई प्रतिशत से भी कम।

अगर विजय अंकल ने वही दस लाख रुपये निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में लगाया होता, तो आज उनके पास लगभग एक करोड़ बीस लाख रुपये होते। और महंगाई-समायोजित करने पर भी उनकी वास्तविक संपत्ति तीन गुना हो गई होती। यह है असली फर्क।

लेकिन इंडेक्स फंड में रिस्क तो है ना?

रमा आंटी का डर बिल्कुल सही है। इंडेक्स फंड में उतार-चढ़ाव होता है। कभी बीस प्रतिशत ऊपर, कभी पंद्रह प्रतिशत नीचे। आपका एक लाख रुपये का निवेश कभी एक लाख बीस हजार हो जाता है तो तीन महीने बाद अस्सी हजार। यह डरावना लगता है। यह बात बिल्कुल सच है।

लेकिन यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझनी होगी – समय की अवधि। अगर आपको एक-दो साल में पैसा चाहिए, तो बिल्कुल, इंडेक्स फंड में मत रखिए। उस समय बाजार नीचे हो सकता है और आपको नुकसान में बेचना पड़ सकता है। शॉर्ट टर्म के लिए इंडेक्स फंड सही विकल्प नहीं है।

लेकिन अगर आपका निवेश पांच-दस-पंद्रह साल के लिए है, तो पूरी तस्वीर बदल जाती है। पिछले तीस साल का डेटा देखें तो निफ्टी पचास ने किसी भी दस साल की अवधि में हमेशा सकारात्मक रिटर्न दिया है। चाहे आपने सबसे खराब समय में निवेश किया हो जब बाजार सबसे ऊपर था, दस साल बाद आपको फायदा ही हुआ है।

हां, बीच में उतार-चढ़ाव जरूर आए। दो हजार आठ में जब बाजार क्रैश हुआ, कोविड में जब चालीस प्रतिशत गिरावट आई। ऐसे कई मौके आए जब देखकर दिल डूब गया होगा। लेकिन अगर आपने धैर्य रखा और बेचा नहीं, तो लंबी अवधि में हमेशा रिकवरी हुई और अच्छा फायदा हुआ।

दो दोस्तों की कहानी – मोहन और सोहन

आइए दो दोस्तों की कहानी देखें जो बहुत कुछ सिखाती है। मोहन और सोहन दोनों की उम्र तीस साल थी साल दो हजार दस में। दोनों इंजीनियर थे, अच्छी नौकरी करते थे। दोनों के पास बचत के दस लाख रुपये थे।

मोहन ने सोचा – सुरक्षा पहले। मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि एफडी से सुरक्षित कुछ नहीं। उन्होंने पूरे दस लाख रुपये फिक्स्ड डिपॉजिट में रख दिए। उस समय आठ प्रतिशत की अच्छी दर मिल रही थी। हर पांच साल बाद वे एफडी को मैच्योर होने पर फिर से रिन्यू करवाते रहे। कभी आठ प्रतिशत मिला, कभी साढ़े सात, कभी साढ़े छह।

सोहन ने दस लाख रुपये निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में एकमुश्त लगा दिए। उन्होंने सोचा कि उन्हें यह पैसा अगले पंद्रह-बीस साल तक नहीं चाहिए। यह उनकी रिटायरमेंट के लिए बचत है। तो लंबी अवधि के लिए इक्विटी बेहतर रहेगी।

अब देखते हैं कि दो हजार पच्चीस में यानी पंद्रह साल बाद दोनों दोस्तों के पास क्या है।

मोहन के पास है लगभग इकतीस लाख रुपये। एफडी ने अच्छा काम किया। कंपाउंड ब्याज की वजह से पैसा तीन गुना से ज्यादा हो गया। मोहन अपने फैसले से काफी खुश हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने सही किया जो रिस्क नहीं लिया।

सोहन के पास है लगभग पैंसठ से सत्तर लाख रुपये। उनका पैसा साढ़े छह से सात गुना हो गया। बीच में कई बार बाजार गिरा। दो हजार ग्यारह-बारह में, दो हजार सोलह में, दो हजार बीस में कोविड के दौरान। हर बार सोहन के दोस्तों ने कहा कि बेच दो, नुकसान हो जाएगा। लेकिन सोहन ने धैर्य रखा। और हर बार बाजार ने रिकवर किया।

लेकिन असली तस्वीर तो महंगाई-समायोजित देखने पर मिलती है। दो हजार दस में जिस चीज की कीमत एक लाख रुपये थी – मान लीजिए एक अच्छी कार – आज उसकी कीमत है लगभग तीन लाख रुपये। यानी महंगाई ने सात से आठ प्रतिशत सालाना की दर से असर किया।

मोहन के इकतीस लाख रुपये की आज की क्रय शक्ति है दो हजार दस के लगभग दस से ग्यारह लाख रुपये जितनी। यानी असली फायदा बहुत कम है। महंगाई ने लगभग सारा ब्याज खा लिया।

सोहन के सत्तर लाख की क्रय शक्ति है दो हजार दस के तेईस से पच्चीस लाख जितनी। यानी उन्होंने अपनी संपत्ति को वास्तव में दुगुना से ज्यादा कर लिया। असली फायदा यही है।

मानसिक शांति का दूसरा पहलू

रमा आंटी अब कहेंगी – “लेकिन बेटा, बीच के पंद्रह साल में सोहन को कितनी बेचैनी हुई होगी। रोज उठकर बाजार देखना, कभी ऊपर तो कभी नीचे। दो हजार बीस में जब कोविड आया और बाजार चालीस प्रतिशत गिर गया, तब उसकी क्या हालत हुई होगी। रात को नींद आई होगी? मेरी एफडी में तो कोई टेंशन नहीं। मैं चैन से सोती हूं।”

यह बात भी कुछ हद तक सही है। लेकिन यहां दो-तीन बातें हैं जो समझनी जरूरी हैं।

पहली बात, अगर सोहन ने इंडेक्स फंड की प्रकृति ठीक से समझ ली थी पहले दिन से, तो उसे पता था कि यह उतार-चढ़ाव आएंगे। यह इक्विटी का स्वभाव है। उसने मानसिक तैयारी कर ली थी। उसने रोज अपना फंड चेक नहीं किया। साल में एक-दो बार स्टेटमेंट देखी और बाकी समय अपनी जिंदगी जी। तो टेंशन उतनी नहीं थी जितनी रमा आंटी सोच रही हैं।

दूसरी बात, मोहन को भी टेंशन थी। अलग तरह की। जब ब्याज दरें गिरने लगीं और एफडी रिन्यूअल पर उन्हें आठ प्रतिशत की जगह सात, फिर साढ़े छह, फिर छह, फिर साढ़े पांच प्रतिशत मिलने लगा, तब उन्हें चिंता हुई। उनकी प्लान्ड इनकम कम हो गई। जब दोस्त बता रहे थे कि उन्होंने शेयर बाजार से कितना कमाया, तब मोहन को फिक्र हुई कि कहीं उन्होंने गलत फैसला तो नहीं लिया।

तीसरी बात, जब मोहन ने अपनी वास्तविक क्रय शक्ति की गणना की और देखा कि पंद्रह साल में उसकी संपत्ति असल में बहुत कम बढ़ी है, तब उन्हें बहुत निराशा हुई। उन्हें लगा कि उन्होंने पंद्रह साल बर्बाद कर दिए।

तो मानसिक शांति का मामला भी इतना सीधा नहीं है। दोनों के अपने-अपने तनाव हैं। बस तनाव की प्रकृति अलग है।

सुरक्षा का भ्रम

सबसे बड़ी गलतफहमी जो लोगों को है वह यह कि एफडी पूरी तरह सुरक्षित है। नॉमिनल तौर पर यानी रुपयों की गिनती में यह बात सही है। आपके दस लाख रुपये डूबेंगे नहीं। बैंक आपको मैच्योरिटी पर पूरे पैसे वापस कर देगी।

लेकिन रियल टर्म्स में यानी क्रय शक्ति के हिसाब से, एफडी बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है। बल्कि यह काफी असुरक्षित है। क्योंकि महंगाई चुपचाप, धीरे-धीरे आपके पैसे की वैल्यू खा जाती है। आप देख भी नहीं पाते और आपकी संपत्ति घट जाती है।

श्याम अंकल की कहानी देखिए। वे बीस साल पहले एफडी से पैंतीस हजार रुपये सालाना ब्याज कमा रहे थे। उस समय यह अच्छी आमदनी थी। इससे उनके घर का तीन-चार महीने का खर्च निकल जाता था। आज भी वे एफडी से लगभग पैंतीस से चालीस हजार ब्याज कमा रहे हैं।

लेकिन आज की पैंतीस हजार की वैल्यू बीस साल पहले की वैल्यू से बहुत कम है। आज यह रकम उनके घर का एक महीने का खर्च भी मुश्किल से निकालती है। उनका जीवन स्तर गिर गया है। उन्हें अपने खर्चे कम करने पड़े हैं। यह है असली असुरक्षा।

दूसरी तरफ, रवि अंकल ने बीस साल पहले इंडेक्स फंड में निवेश किया था। शुरुआत में उन्हें कोई नियमित इनकम नहीं थी, सिर्फ ग्रोथ थी। लेकिन आज जब उन्होंने कुछ यूनिट्स बेचीं, तो उन्हें बहुत अच्छा पैसा मिला। अब वे सिस्टेमैटिक विदड्रॉल प्लान के जरिए हर महीने एक अच्छी रकम निकाल रहे हैं और उनका जीवन स्तर अच्छा है। बल्कि पहले से बेहतर है।

तो क्या एफडी की कोई जगह नहीं?

अब तक की चर्चा से ऐसा लग सकता है कि एफडी बिल्कुल बेकार है और किसी को एफडी में पैसा नहीं रखना चाहिए। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। एफडी की अपनी जगह है और कुछ स्थितियां हैं जहां एफडी बेहतर विकल्प है।

पहली स्थिति – अगर आपको एक-दो साल में पैसा चाहिए। जैसे अगले साल बच्चे की स्कूल फीस देनी है दस लाख रुपये। या दो साल बाद घर खरीदना है और उसका डाउन पेमेंट चाहिए बीस लाख रुपये। इस तरह के शॉर्ट टर्म गोल्स के लिए एफडी परफेक्ट है। क्योंकि आपको पूरी तरह पता है कि मैच्योरिटी पर कितना मिलेगा। कोई मार्केट रिस्क नहीं है।

दूसरी स्थिति – अगर आप रिटायर हो चुके हैं और आपको नियमित आमदनी चाहिए। आप हर महीने खर्चे के लिए एक निश्चित रकम चाहते हैं। तो आपके पोर्टफोलियो का कुछ अच्छा खासा हिस्सा एफडी और दूसरे डेट इंस्ट्रूमेंट्स में होना चाहिए। यह आपको स्टेबिलिटी देगा।

तीसरी स्थिति – अगर आप बहुत ज्यादा रिस्क एवर्स हैं। आपका स्वभाव ही ऐसा है कि इक्विटी के उतार-चढ़ाव आप बर्दाश्त नहीं कर सकते। आपको रात को नींद नहीं आएगी अगर आपका पोर्टफोलियो दस प्रतिशत नीचे चला गया। तो बेहतर है कि एफडी में ही रखिए। मानसिक शांति भी एक बहुत बड़ी वैल्यू है। अगर इंडेक्स फंड की वजह से आपकी जिंदगी की क्वालिटी खराब हो जाएगी, तो क्या फायदा?

लेकिन लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए – जैसे रिटायरमेंट जो बीस-पच्चीस साल दूर है, बच्चों की पढ़ाई जो पंद्रह साल बाद है, घर खरीदना जो दस साल बाद है – इन सबके लिए इंडेक्स फंड बेहतर विकल्प है।

बैलेंस्ड अप्रोच – सबसे समझदारी भरा रास्ता

प्रिया ने अपनी मां रमा आंटी को बहुत प्यार से समझाया। “मम्मी, मैं यह नहीं कह रही कि आप पूरा पैसा इंडेक्स फंड में लगा दीजिए। मैं जानती हूं कि आप सुरक्षा चाहती हैं। मैं सिर्फ इतना कह रही हूं कि थोड

 

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