अध्याय 6: इंडेक्स फंड बनाम सीधा शेयर खरीदना | Index Funds vs Direct Stocks in Hindi

Index Funds vs Direct Stocks
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अमित की महत्वाकांक्षा

अमित अट्ठाईस साल के हैं। आईटी कंपनी में काम करते हैं। तकनीक से प्यार करते हैं और नंबर्स में दिलचस्पी रखते हैं। जब उन्होंने निवेश के बारे में सोचना शुरू किया, तो उनके मन में एक सवाल आया – अगर इंडेक्स फंड सिर्फ पचास कंपनियों के शेयर खरीदता है, तो मैं खुद क्यों नहीं खरीद सकता? क्यों बीच में फंड हाउस को फीस दूं?

उन्होंने अपने दोस्त राजीव से बात की जो पिछले पांच साल से शेयर बाजार में एक्टिव थे। राजीव ने कहा, “भाई, डायरेक्ट स्टॉक निवेश ही असली खेल है। मैंने टाटा कंसल्टेंसी के शेयर खरीदे थे तीन साल पहले। आज डबल हो गए हैं। अगर तुम इंडेक्स फंड में लगाते तो इतना रिटर्न नहीं मिलता। और फंड हाउस को फीस भी बचती है।”

अमित का मन बना। उन्होंने सोचा – मैं इंजीनियर हूं, एनालिटिकल सोच रखता हूं। एक्सेल में अच्छा काम कर लेता हूं। पांच-दस कंपनियों की रिसर्च करना और उनके शेयर खरीदना कितना मुश्किल होगा? उन्होंने तीन लाख रुपये लेकर अपना स्टॉक निवेश का सफर शुरू किया।

दो साल बाद आज अमित थोड़े परेशान हैं। उनके तीन लाख रुपये बढ़कर साढ़े तीन लाख हुए हैं। सत्रह प्रतिशत का रिटर्न। बुरा नहीं है। लेकिन उसी समय निफ्टी फिफ्टी पैंतीस प्रतिशत बढ़ गया। अगर वे इंडेक्स फंड में लगाते तो आज उनके पास चार लाख पांच हजार रुपये होते। साठ हजार रुपये का फर्क।

लेकिन असली कहानी पैसे से ज्यादा समय और मेहनत की है। आइए देखते हैं कि डायरेक्ट स्टॉक निवेश और इंडेक्स फंड में क्या फर्क है।

डायरेक्ट स्टॉक निवेश का आकर्षण

पहले समझते हैं कि डायरेक्ट स्टॉक निवेश इतना आकर्षक क्यों लगता है। जब आप खुद शेयर खरीदते हैं, तो आपको लगता है कि आप कंट्रोल में हैं। आप तय करते हैं कि कौन सी कंपनी में पैसा लगाना है। कितना लगाना है। कब बेचना है। यह फीलिंग बहुत अच्छी होती है।

दूसरा, अगर आप सही स्टॉक चुन लेते हैं तो रिटर्न बहुत ज्यादा हो सकता है। राजीव ने जो टीसीएस के शेयर खरीदे थे, वे दो साल में डबल हो गए। यह सौ प्रतिशत रिटर्न है। कोई इंडेक्स फंड इतना नहीं देता।

तीसरा, कोई फंड मैनेजमेंट फीस नहीं। आप सीधे ब्रोकर के जरिए शेयर खरीदते हैं। ब्रोकरेज बहुत कम होती है। आजकल तो बहुत से ब्रोकर जीरो ब्रोकरेज भी देते हैं। तो सारा रिटर्न आपका।

चौथा, आप सेलेक्टिव हो सकते हैं। अगर आपको लगता है कि किसी सेक्टर में मौका है, तो उसी सेक्टर की बेहतरीन कंपनियां चुन सकते हैं। इंडेक्स फंड तो सब कुछ खरीद लेता है – अच्छी कंपनियां भी और औसत कंपनियां भी।

यह सब सुनकर लगता है कि डायरेक्ट स्टॉक निवेश ही सबसे अच्छा है। लेकिन असली तस्वीर कुछ और है।

अमित के दो साल की डायरेक्ट स्टॉक्स में निवेश की यात्रा

आइए अमित के दो साल के अनुभव को विस्तार से देखते हैं। पहले महीने अमित ने बहुत उत्साह से शुरुआत की। उन्होंने वीकेंड पर दस-बारह घंटे रिसर्च में लगाए। कंपनियों की बैलेंस शीट पढ़ीं, पी/ई रेशियो देखे, प्रॉफिट मार्जिन की तुलना की। आखिरकार पांच कंपनियां चुनीं – रिलायंस, एचडीएफसी बैंक, इन्फोसिस, एशियन पेंट्स, और मारुति।

पहले तीन महीने अच्छे रहे। सारे स्टॉक्स बढ़ रहे थे। अमित को लगा कि उन्होंने सही फैसला लिया। वे रोज सुबह उठकर सबसे पहले अपना डीमैट अकाउंट चेक करते। दफ्तर में लंच के समय भी एक बार देख लेते। शाम को घर पहुंचकर फिर से चेक करते।

फिर बाजार में कुछ गिरावट आई। रिलायंस दस प्रतिशत नीचे चला गया। अमित परेशान हो गए। क्या बेच देना चाहिए? लेकिन सबने कहा था कि लॉन्ग टर्म होल्ड करो। तो उन्होंने रोक लिया। दो महीने बाद रिलायंस फिर ऊपर आ गया। राहत की सांस।

छह महीने बाद अमित ने सोचा कि फार्मा सेक्टर में अच्छा मौका दिख रहा है। उन्होंने एचडीएफसी बैंक बेचकर सन फार्मा खरीद लिया। लेकिन अगले तीन महीने में सन फार्मा गिर गया और एचडीएफसी बैंक बीस प्रतिशत ऊपर चला गया। अमित ने गलत टाइमिंग में बदलाव किया था।

एक साल बाद अमित थक रहे थे। हर दिन मार्केट देखना, हर खबर पर नजर रखना, क्वार्टरली रिजल्ट्स ट्रैक करना – यह सब बहुत समय ले रहा था। उनका दफ्तर का काम प्रभावित होने लगा। परिवार के साथ समय कम हो गया। वीकेंड पर भी वे लैपटॉप पर स्टॉक रिसर्च करते रहते।

जो चीजें दिखती नहीं

अमित की कहानी में कुछ चीजें हैं जो दिखती नहीं लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहली चीज है समय। अमित ने दो साल में लगभग चार-पांच सौ घंटे स्टॉक रिसर्च और ट्रैकिंग में लगाए। अगर उनकी घंटे की कमाई पांच सौ रुपये है, तो इन पांच सौ घंटों की वैल्यू है ढाई लाख रुपये।

अगर वे यह समय अपनी स्किल बढ़ाने में लगाते, कोई नया कोर्स करते, या परिवार के साथ बिताते, तो क्या वह ज्यादा वैल्युएबल नहीं होता? यह ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट है जो कभी दिखती नहीं।

दूसरी चीज है मानसिक तनाव। अमित की पत्नी प्रिया कहती हैं कि पिछले दो साल में अमित हमेशा अपने फोन में लगे रहते हैं। खाने की मेज पर भी, सोने से पहले भी। बच्चों को भी शिकायत है कि पापा अब खेलने का समय नहीं देते। यह मानसिक और भावनात्मक लागत है।

तीसरी चीज है भावनात्मक निर्णय। जब आपका खुद चुना हुआ स्टॉक गिरता है, तो बहुत बुरा लगता है। अहंकार को चोट लगती है। तब आप भावनात्मक फैसले लेने लगते हैं। ज्यादा नुकसान से बचने के लिए घबराकर बेच देते हैं। या फिर अपनी गलती मानने से बचने के लिए गिरते स्टॉक को पकड़े रहते हैं।

विविधीकरण की चुनौती

अमित ने पांच कंपनियों में निवेश किया था। लेकिन पोर्टफोलियो मैनेजमेंट का एक सुनहरा नियम है – आपके पास कम से कम बीस-पच्चीस अलग-अलग कंपनियों के शेयर होने चाहिए ठीक से डाइवर्सिफाई करने के लिए। और वे भी अलग-अलग सेक्टर्स से।

लेकिन बीस-पच्चीस कंपनियों की रिसर्च करना और उन्हें ट्रैक करना कितना मुश्किल है? अमित के पास तो पांच कंपनियों के लिए भी समय नहीं था। और अगर आप बीस-पच्चीस कंपनियों में पैसा बांटेंगे, तो हर कंपनी में कितना जाएगा?

मान लीजिए अमित के पास तीन लाख रुपये हैं। बीस कंपनियों में बराबर बांटें तो हर कंपनी में पंद्रह हजार। लेकिन ज्यादातर अच्छे स्टॉक्स की कीमत एक से तीन हजार रुपये के बीच होती है। तो पंद्रह हजार में केवल पांच-दस शेयर ही खरीद पाएंगे। यह बहुत कम है।

और जब आप बीस-पच्चीस कंपनियों में निवेश कर लेते हैं, तो आप असल में एक इंडेक्स फंड ही बना रहे हैं। बस बहुत ज्यादा मेहनत और समय लगाकर। और फिर भी आपका पोर्टफोलियो इंडेक्स फंड जितना डाइवर्सिफाइड नहीं होगा।

रिसर्च का भ्रम

अमित को लगता था कि वे अच्छी रिसर्च कर रहे हैं। उन्होंने कंपनियों की एनुअल रिपोर्ट्स पढ़ीं, फाइनेंशियल रेशियो देखे। लेकिन क्या वे वाकई में उतनी गहराई से समझ पाए जितना एक प्रोफेशनल एनालिस्ट समझता है जो पिछले दस साल से उसी सेक्टर को ट्रैक कर रहा है?

प्रोफेशनल एनालिस्ट्स के पास टूल्स होते हैं, डेटाबेस होते हैं, कंपनी मैनेजमेंट से मिलने का मौका होता है। उनकी पूरी टीम होती है। अमित अकेले हैं, सीमित जानकारी के साथ।

और सबसे बड़ी बात – भले ही अमित ने कितनी भी अच्छी रिसर्च कर ली हो, बाजार में लाखों दूसरे निवेशक भी हैं। बहुत से उनसे ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा अनुभवी, और ज्यादा जानकारी वाले। जब तक अमित को कोई अच्छी खबर मिलती है, बाजार ने पहले ही उस खबर को स्टॉक की कीमत में शामिल कर दिया होता है।

टाइमिंग की समस्या

शेयर बाजार में सफल होने के लिए दो चीजें चाहिए – सही स्टॉक चुनना और सही समय पर खरीदना-बेचना। अमित ने सही स्टॉक्स चुने थे – रिलायंस, एचडीएफसी बैंक, इन्फोसिस। ये सब अच्छी कंपनियां हैं। लेकिन टाइमिंग गड़बड़ हो गई।

उन्होंने जब सन फार्मा खरीदा, उससे पहले ही वह स्टॉक काफी ऊपर जा चुका था। और जब बेचा तो नीचे था। यह है टाइमिंग की समस्या। और यह हर निवेशक के साथ होता है।

वॉरेन बफेट ने एक बार कहा था – “बाजार में समय बिताना, बाजार का समय पकड़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण है।” मतलब यह कि सही समय पर खरीदने-बेचने की कोशिश में समय बर्बाद मत करो। बस लंबे समय के लिए अच्छी चीज में निवेश करो और होल्ड करो।

इंडेक्स फंड में यह समस्या नहीं है। आप एसआईपी से हर महीने निवेश करते रहते हैं। कभी ऊपर खरीदा, कभी नीचे। लंबी अवधि में यह औसत हो जाता है। टाइमिंग की चिंता ही नहीं।

होम बायस और फेमिलियरिटी बायस

अमित ने जो पांच कंपनियां चुनीं, उसमें एक पैटर्न था। सब बड़ी, जानी-मानी कंपनियां थीं। रिलायंस – सबको पता है। एचडीएफसी बैंक – हर जगह ब्रांच है। इन्फोसिस – आईटी में काम करने वाले हर किसी को पता है। एशियन पेंट्स – घर में पेंट लगा है। मारुति – सड़क पर हर तीसरी कार।

यह है फेमिलियरिटी बायस। हम उन कंपनियों में निवेश करते हैं जिन्हें हम जानते हैं। लेकिन किसी कंपनी को जानना और उसके शेयर का सही मूल्यांकन करना दो अलग चीजें हैं।

हो सकता है कि कोई छोटी, कम जानी-मानी कंपनी बहुत बेहतर रिटर्न दे। लेकिन आप उसे चुनेंगे नहीं क्योंकि आपने उसका नाम नहीं सुना। और जो बड़ी कंपनी आपने चुनी, वह पहले से ही महंगी हो सकती है क्योंकि हर कोई उसमें निवेश कर रहा है।

इंडेक्स फंड में यह बायस नहीं है। वह सिर्फ मार्केट कैप देखता है। जो कंपनी टॉप पचास में है, वह शामिल है। चाहे आप उसे जानते हों या नहीं।

कंसंट्रेशन रिस्क

अमित के पांच स्टॉक्स में से एक था रिलायंस। उन्होंने तीन लाख में से साठ हजार रिलायंस में लगाए थे। यानी उनके पोर्टफोलियो का बीस प्रतिशत एक ही कंपनी में।

अब अगर रिलायंस के साथ कुछ गलत होता – कोई बड़ा कर्ज, कोई स्कैम, कोई बड़ा नुकसान – तो अमित के पोर्टफोलियो का बीस प्रतिशत डूब सकता था। यह है कंसंट्रेशन रिस्क।

निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में रिलायंस का वेटेज लगभग दस प्रतिशत है। तो अगर रिलायंस में कुछ गड़बड़ होती है, तो आपके पोर्टफोलियो का केवल दस प्रतिशत प्रभावित होगा। और वह भी पूरी तरह नहीं, क्योंकि रिलायंस पूरी तरह से जीरो तो नहीं हो जाएगी।

और निफ्टी में पचास कंपनियां हैं। तो किसी एक कंपनी पर निर्भरता बहुत कम है। यह सही मायने में विविधीकरण है।

ट्रांजेक्शन कॉस्ट जो दिखती नहीं

अमित सोचते थे कि इंडेक्स फंड की फीस बचा रहे हैं। लेकिन उन्होंने छिपी हुई लागतों का हिसाब नहीं लगाया। हर बार जब वे कोई स्टॉक खरीदते या बेचते हैं, तो कुछ लागतें आती हैं।

पहली है ब्रोकरेज। भले ही जीरो ब्रोकरेज हो, लेकिन एसटीटी यानी सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स तो लगता ही है। फिर जीएसटी लगती है। फिर स्टाम्प ड्यूटी लगती है। ये सब मिलाकर हर ट्रांजेक्शन पर लगभग दशमलव दो से दशमलव तीन प्रतिशत लागत आती है।

अमित ने दो साल में लगभग बीस बार खरीदा-बेचा। हर बार थोड़ा-थोड़ा पैसा कटता रहा। कुल मिलाकर उन्होंने लगभग पांच से छह हजार रुपये इन लागतों में गंवाए। यह उनके तीन लाख के निवेश का लगभग दो प्रतिशत है।

इंडेक्स फंड में ये लागतें नहीं हैं। आप एसआईपी करते हो तो कोई ट्रांजेक्शन चार्ज नहीं। और फंड जब भी खरीदता-बेचता है, वह बहुत बड़ी मात्रा में करता है तो बेहतर रेट मिलता है।

टैक्सेशन की जटिलता

अमित ने जब एचडीएफसी बैंक बेचकर सन फार्मा खरीदा, तो उन्हें एचडीएफसी बैंक पर कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ा। क्योंकि एचडीएफसी बैंक के शेयर बढ़ गए थे और उन्होंने मुनाफे में बेचा।

हर बार जब आप मुनाफे में स्टॉक बेचते हैं, टैक्स लगता है। अगर एक साल से कम समय में बेचा तो शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन – बीस प्रतिशत टैक्स। एक साल से ज्यादा बाद बेचा तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन – साढ़े बारह प्रतिशत टैक्स।

और हर बार टैक्स रिटर्न फाइल करते समय सारे ट्रांजेक्शन की डिटेल देनी पड़ती है। यह बहुत झंझट है।

इंडेक्स फंड में यह सब नहीं है। फंड के अंदर जो भी ट्रांजेक्शन होते हैं, उनका टैक्स आपको नहीं देना। आप पर टैक्स तब लगता है जब आप फंड की यूनिट्स बेचते हैं। और अगर तीन साल से ज्यादा होल्ड किया तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन – साढ़े बारह प्रतिशत टैक्स। बस एक बार, आखिर में।

इमोशनल रोलर कोस्टर

सबसे बड़ी समस्या जो अमित ने फेस की वह थी भावनात्मक। जब उनके स्टॉक्स बढ़ रहे थे, तो वे बहुत खुश थे। उन्हें लग रहा था कि वे बहुत स्मार्ट हैं। वे दोस्तों को बताते कि उन्होंने कितना मुनाफा कमाया।

लेकिन जब स्टॉक्स गिरे, तो उनकी नींद हराम हो गई। रात को सोचते रहते कि क्या गलत हुआ। क्या बेच देना चाहिए? क्या और खरीद लेना चाहिए? यह मानसिक तनाव बहुत ज्यादा था।

सबसे बुरा तब हुआ जब उन्होंने भावनात्मक फैसले लिए। जब एचडीएफसी बैंक थोड़ा गिरा, तो डर से बेच दिया। और फिर वह ऊपर चला गया। जब सन फार्मा बढ़ रहा था, तो लालच में और खरीद लिया। और फिर वह गिर गया।

यह है भावनाओं का खेल। और यह हर निवेशक के साथ होता है जो डायरेक्ट स्टॉक्स में है।

इंडेक्स फंड में यह समस्या बहुत कम है। आप जानते हैं कि आप पूरे बाजार में निवेश कर रहे हैं। किसी एक स्टॉक के ऊपर-नीचे होने से आप इमोशनल नहीं होते। आप बस एसआईपी करते रहते हैं और अपनी जिंदगी जीते रहते हैं।

विनय की कहानी – इंडेक्स फंड निवेशक

अब विनय की कहानी देखिए जो अमित के कॉलेज फ्रेंड हैं। विनय ने भी उसी समय निवेश शुरू किया था जब अमित ने। उनके पास भी तीन लाख रुपये थे।

लेकिन विनय ने सोचा – मैं मार्केटिंग का आदमी हूं, फाइनेंस मेरी एक्सपर्टाइज नहीं है। मुझे नहीं पता कौन सा स्टॉक अच्छा है। और मेरे पास इतना समय भी नहीं है कि रिसर्च करूं। मैं सिंपल रास्ता अपनाता हूं।

विनय ने पूरे तीन लाख रुपये निफ्टी पचास इंडेक्स फंड में लगा दिए। बस एक ही फंड। कोई कॉम्प्लेक्सिटी नहीं।

दो साल में विनय ने अपना फंड केवल चार बार देखा। हर छह महीने में एक बार। बस यह चेक किया कि सब ठीक चल रहा है। बाकी समय वे अपने काम में, अपने परिवार में, अपने शौक में व्यस्त रहे।

दो साल बाद आज विनय के पास चार लाख पांच हजार रुपये हैं। पैंतीस प्रतिशत रिटर्न। अमित से बीस हजार रु

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