सोनिया की दुविधा
सोनिया तीस साल की मार्केटिंग मैनेजर हैं। पिछले छह महीने से वे निवेश के बारे में पढ़ रही हैं। उन्होंने इंडेक्स फंड के बारे में सीखा और उत्साहित हो गईं। लेकिन जब उन्होंने अपने कॉलेज के दोस्तों से बात की, तो सबकी राय अलग थी।
उनकी दोस्त अनन्या ने कहा, “मैं तो एक्टिव म्यूचुअल फंड में निवेश करती हूं। मेरा फंड मैनेजर बहुत एक्सपर्ट है। पिछले तीन साल में उसने मार्केट को बीस प्रतिशत से हरा दिया है। इंडेक्स फंड तो बस एवरेज रिटर्न देता है ना?”
उनके भाई ने कहा, “देखो सोनिया, अगर तुम सिर्फ एवरेज चाहती हो तो इंडेक्स फंड लो। लेकिन अगर अच्छा रिटर्न चाहिए तो एक्टिव फंड ही लेना पड़ेगा। वहां फंड मैनेजर रोज मेहनत करता है, रिसर्च करता है, सही स्टॉक्स चुनता है।”
उनके ऑफिस के फाइनेंशियल एडवाइजर ने भी कहा, “मैडम, मैं आपको कुछ टॉप परफॉर्मिंग एक्टिव फंड्स दिखा सकता हूं। देखिए इस फंड ने पिछले पांच साल में अठारह प्रतिशत रिटर्न दिया है जबकि निफ्टी ने सिर्फ तेरह प्रतिशत दिया। फर्क साफ है ना?”
सोनिया फिर से कन्फ्यूज हो गईं। उन्हें लगा कि शायद उन्होंने गलत फैसला लिया है। क्या सच में एक्टिव फंड बेहतर है? क्या इंडेक्स फंड सिर्फ उन लोगों के लिए है जो कुछ नहीं समझते? क्या वे अपने पैसे पर कम रिटर्न के साथ समझौता कर रही हैं?
अगर आप भी सोनिया की तरह इस सवाल से जूझ रहे हैं, तो यह अध्याय आपके लिए है। आइए बिना किसी पक्षपात के, आंकड़ों और तथ्यों के साथ समझते हैं कि इंडेक्स फंड और एक्टिव म्यूचुअल फंड में असली फर्क क्या है।
एक्टिव म्यूचुअल फंड क्या है?
पहले समझते हैं कि एक्टिव म्यूचुअल फंड होता क्या है। इसमें एक फंड मैनेजर होता है जो रोज सक्रिय रूप से काम करता है। वह बाजार की स्थिति देखता है, कंपनियों का विश्लेषण करता है, और फैसला करता है कि कौन सी कंपनी के शेयर खरीदने हैं और कौन सी के बेचने हैं।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक फंड मैनेजर को लगता है कि फार्मा सेक्टर में अच्छा मौका है। तो वह अपने फंड में फार्मा कंपनियों के शेयर्स ज्यादा खरीद लेता है। अगर उसे लगता है कि आईटी सेक्टर में अब मंदी आने वाली है, तो वह आईटी के शेयर बेच देता है। यह सब वह बाजार को बीट करने के लिए करता है।
फंड मैनेजर के साथ एक पूरी टीम होती है। रिसर्च एनालिस्ट जो कंपनियों का अध्ययन करते हैं। इकोनॉमिस्ट जो अर्थव्यवस्था के रुझान देखते हैं। सेक्टर एक्सपर्ट्स जो अलग-अलग इंडस्ट्रीज को समझते हैं। यह सब लोग मिलकर फैसले लेते हैं।
एक्टिव फंड का उद्देश्य साफ है – इंडेक्स से बेहतर परफॉर्म करना। अगर निफ्टी पचास बारह प्रतिशत रिटर्न दे रहा है, तो एक्टिव फंड का लक्ष्य है पंद्रह या सोलह प्रतिशत देना। इसे अल्फा कहते हैं – इंडेक्स से ऊपर का रिटर्न।
इंडेक्स फंड और एक्टिव फंड में मूल अंतर
अब तुलना करते हैं। इंडेक्स फंड में कोई फंड मैनेजर एक्टिव रूप से काम नहीं करता। फंड सिर्फ इंडेक्स की नकल करता है। अगर निफ्टी में रिलायंस का वेटेज दस प्रतिशत है, तो फंड में भी दस प्रतिशत। कोई फैसला लेने की जरूरत नहीं।
इससे क्या फर्क पड़ता है? सबसे पहला फर्क है लागत में। एक्टिव फंड को फंड मैनेजर की सैलरी देनी पड़ती है, रिसर्च टीम को पेमेंट करना पड़ता है, बार-बार शेयर खरीदने-बेचने की लागत आती है। इसलिए एक्सपेंस रेशियो डेढ़ से ढाई प्रतिशत तक होता है।
इंडेक्स फंड में यह सब नहीं चाहिए। बस एक छोटी टीम जो इंडेक्स को ट्रैक करे। इसलिए एक्सपेंस रेशियो केवल दशमलव एक से दशमलव पांच प्रतिशत होता है। यह भारी फर्क है।
दूसरा फर्क है पारदर्शिता में। इंडेक्स फंड में आपको हमेशा पता रहता है कि आपका पैसा कहां लगा है। क्योंकि वह इंडेक्स को फॉलो करता है और इंडेक्स की कंपोजीशन पब्लिक होती है। लेकिन एक्टिव फंड में फंड मैनेजर लगातार बदलाव करता रहता है। आज जो पोर्टफोलियो है, कल अलग हो सकता है।
तीसरा फर्क है स्थिरता में। इंडेक्स फंड का परफॉर्मेंस हमेशा इंडेक्स जैसा रहेगा। ज्यादा नहीं, कम नहीं। लेकिन एक्टिव फंड अनिश्चित है। कभी बहुत अच्छा कर सकता है, कभी बहुत खराब।
वह डेटा जो चौंकाता है
अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर। वास्तव में कौन बेहतर परफॉर्म करता है? एसपीआईवीए इंडिया नाम की एक रिपोर्ट हर साल आती है जो इसका विश्लेषण करती है। दो हजार तेईस की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दस साल में लगभग अस्सी प्रतिशत एक्टिव लार्ज कैप फंड्स निफ्टी पचास को हरा नहीं पाए।
आप सोच रहे होंगे कि मैंने गलत टाइप किया। नहीं, यह सही है। अस्सी प्रतिशत एक्टिव फंड्स इंडेक्स से कम रिटर्न देते हैं। सिर्फ बीस प्रतिशत फंड्स ही इंडेक्स को बीट कर पाते हैं।
और यह सिर्फ भारत की बात नहीं है। अमेरिका में यह आंकड़ा और भी खराब है। वहां पिछले पंद्रह साल में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा एक्टिव फंड्स एसएंडपी पांच सौ इंडेक्स को हरा नहीं पाए।
लेकिन यह कैसे हो सकता है? इतने पढ़े-लिखे फंड मैनेजर्स, इतनी रिसर्च, इतना एक्सपीरिएंस – फिर भी वे एक साधारण से इंडेक्स को क्यों नहीं हरा पाते?
क्यों एक्टिव फंड्स पिछड़ जाते हैं?
पहला और सबसे बड़ा कारण है लागत। जैसा हमने देखा, एक्टिव फंड्स का एक्सपेंस रेशियो बहुत ज्यादा होता है। अगर किसी फंड को बारह प्रतिशत रिटर्न मिल रहा है और उसमें से दो प्रतिशत लागत काट लो, तो बचता है दस प्रतिशत। इंडेक्स फंड को भी बारह प्रतिशत मिल रहा है लेकिन उसकी लागत केवल दशमलव तीन प्रतिशत है, तो आपको मिलता है ग्यारह दशमलव सात प्रतिशत। फर्क साफ दिख रहा है।
दूसरा कारण है कैश ड्रैग। एक्टिव फंड्स को हमेशा कुछ पैसा कैश में रखना पड़ता है। रिडेम्प्शन के लिए, नए स्टॉक्स खरीदने के लिए। यह कैश पड़ा रहता है और कुछ नहीं कमाता। बुल मार्केट में यह एक बड़ा नुकसान है।
तीसरा कारण है ट्रेडिंग कॉस्ट। जब भी फंड मैनेजर कोई शेयर खरीदता या बेचता है, तो ब्रोकरेज, टैक्स, और मार्केट इम्पैक्ट कॉस्ट लगती है। एक्टिव फंड बार-बार ट्रेड करते हैं, तो यह लागत जमा होती जाती है।
चौथा और सबसे दिलचस्प कारण है – मार्केट को हराना वाकई बहुत मुश्किल है। बाजार में लाखों निवेशक हैं, हजारों एनालिस्ट हैं। हर कोई कोशिश कर रहा है कि वह सबसे पहले अच्छा स्टॉक ढूंढे। इसलिए किसी भी अच्छी खबर का असर तुरंत शेयर की कीमत में आ जाता है। फंड मैनेजर के लिए ऐसा स्टॉक ढूंढना जो बाकी सबने नहीं देखा हो, बहुत मुश्किल है।
लेकिन कुछ एक्टिव फंड्स तो अच्छा करते ही हैं?
बिल्कुल सही। बीस प्रतिशत एक्टिव फंड्स इंडेक्स को हराते हैं। तो सवाल यह है कि क्या हम इन बीस प्रतिशत को पहचान सकते हैं और उनमें निवेश कर सकते हैं?
यहीं पर असली समस्या है। कोई भी फंड जो आज अच्छा कर रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी अच्छा करे। रोहन की कहानी सुनिए।
रोहन ने दो हजार अठारह में एक टॉप परफॉर्मिंग एक्टिव फंड में निवेश किया। वह फंड पिछले पांच साल से बाजार को लगातार हरा रहा था। रोहन बहुत खुश थे। लेकिन दो हजार उन्नीस में उस फंड का फंड मैनेजर बदल गया। नए मैनेजर की स्ट्रैटेजी अलग थी। फंड का परफॉर्मेंस गिरने लगा। दो हजार बीस-इक्कीस में वह फंड इंडेक्स से पीछे चल रहा था।
रोहन को क्या करना चाहिए था? फंड बदलना? लेकिन कौन सा फंड लेना? जो आज अच्छा कर रहा है वह? लेकिन कल वह भी खराब हो सकता है।
यह है एक्टिव फंड की असली समस्या। परफॉर्मेंस कंसिस्टेंट नहीं रहता। जो फंड एक दशक में टॉप परफॉर्मर होता है, वह अगले दशक में बॉटम में हो सकता है।
एक स्टडी के अनुसार, जो फंड्स एक पांच साल की अवधि में टॉप क्वार्टाइल यानी सबसे ऊपर के पच्चीस प्रतिशत में होते हैं, उनमें से केवल पांच से दस प्रतिशत ही अगली पांच साल की अवधि में भी टॉप क्वार्टाइल में रहते हैं। बाकी नीचे आ जाते हैं।
पिछले परफॉर्मेंस का धोखा
यह तो हर म्यूचुअल फंड ऐड में लिखा होता है – “पिछला परफॉर्मेंस भविष्य के परफॉर्मेंस की गारंटी नहीं है।” लेकिन हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं।
प्रिया ने एक फाइनेंशियल मैगजीन में पढ़ा कि एक एक्टिव फंड ने पिछले तीन साल में बीस प्रतिशत सालाना रिटर्न दिया है। वे तुरंत उस फंड में निवेश कर दिया। लेकिन अगले तीन साल में वह फंड केवल आठ प्रतिशत दे पाया। निफ्टी ने उसी अवधि में बारह प्रतिशत दिया।
क्या हुआ? दरअसल जिन तीन सालों में वह फंड बहुत अच्छा चला, उस समय वह हेवी मिडकैप और स्मॉलकैप में था। और उस समय मिडकैप-स्मॉलकैप बहुत तेजी से बढ़ रहे थे। तो फंड का परफॉर्मेंस चमक रहा था। लेकिन फिर मिडकैप-स्मॉलकैप में सुधार आया और फंड का परफॉर्मेंस गिर गया।
यह पैटर्न बार-बार दिखता है। जो फंड आज चमक रहा है, वह शायद किसी एक सेक्टर या एक स्टाइल में भारी निवेशित है जो अभी ट्रेंड में है। जब ट्रेंड बदलता है, फंड का परफॉर्मेंस भी बदल जाता है।
टैक्स का गणित भी महत्वपूर्ण है
एक और पहलू है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है – टैक्सेशन। एक्टिव फंड्स बार-बार शेयर खरीदते-बेचते हैं। हर बार जब वे मुनाफे में शेयर बेचते हैं, तो शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। यह फंड के रिटर्न को कम करता है।
इंडेक्स फंड बहुत कम ट्रेड करता है। केवल तब जब इंडेक्स में कोई बदलाव होता है। इसलिए टैक्स की लागत बहुत कम होती है। यह टैक्स एफिशिएंसी कहलाती है।
मान लीजिए दो फंड्स – एक एक्टिव और एक इंडेक्स – दोनों को बारह प्रतिशत प्री-टैक्स रिटर्न मिल रहा है। लेकिन एक्टिव फंड के बार-बार ट्रेड करने से हर साल टैक्स लगता रहता है। इंडेक्स फंड में टैक्स तब लगता है जब आप निकालते हैं। कंपाउंडिंग के हिसाब से, इंडेक्स फंड का पोस्ट-टैक्स रिटर्न एक्टिव फंड से बेहतर हो जाता है।
तो क्या कोई भी एक्टिव फंड नहीं लेना चाहिए?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। क्या हम कह रहे हैं कि सभी एक्टिव फंड्स खराब हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। कुछ एक्टिव फंड्स वाकई अच्छा काम करते हैं। कुछ फंड मैनेजर्स बहुत कुशल हैं।
लेकिन समस्या यह है कि पहले से यह पहचानना बहुत मुश्किल है कि कौन सा फंड अच्छा करेगा। और यहां तक कि अगर आपने एक अच्छा फंड ढूंढ लिया, तो भी कोई गारंटी नहीं कि वह आगे भी अच्छा करेगा।
कुछ स्थितियां हैं जहां एक्टिव फंड समझ में आ सकता है। अगर आप किसी खास सेक्टर में विश्वास रखते हैं, तो एक अच्छा सेक्टोरल एक्टिव फंड ले सकते हैं। अगर आप मिडकैप या स्मॉलकैप में निवेश करना चाहते हैं, तो वहां अच्छे फंड मैनेजर की जरूरत होती है क्योंकि छोटी कंपनियों में रिसर्च बहुत महत्वपूर्ण है।
लेकिन लार्ज कैप में, जहां सारी कंपनियों पर भरपूर रिसर्च उपलब्ध है, वहां इंडेक्स फंड ज्यादातर मामलों में बेहतर विकल्प है।
रिस्क का भी हिसाब रखें
अक्सर लोग सिर्फ रिटर्न देखते हैं। लेकिन रिस्क भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक्टिव फंड्स में मैनेजर रिस्क होता है। अगर फंड मैनेजर गलत फैसला ले लेता है, तो आपका पूरा पोर्टफोलियो प्रभावित हो सकता है।
अर्जुन की कहानी देखिए। उनके एक्टिव फंड के मैनेजर ने सोचा कि रियल एस्टेट सेक्टर में तेजी आने वाली है। उन्होंने फंड का तीस प्रतिशत रियल एस्टेट कंपनियों में लगा दिया। लेकिन रियल एस्टेट सेक्टर में मंदी आ गई। अर्जुन के फंड का परफॉर्मेंस बुरी तरह गिर गया।
इंडेक्स फंड में यह रिस्क नहीं है। कोई एक व्यक्ति फैसला नहीं ले रहा। इंडेक्स मार्केट कैप के आधार पर बनता है, जो हजारों निवेशकों के सामूहिक फैसलों का नतीजा है।
फंड मैनेजर बदलने का रिस्क
एक और बड़ा रिस्क है जो लोग नजरअंदाज करते हैं। अगर किसी एक्टिव फंड का फंड मैनेजर बदल जाए तो क्या होगा? यह अक्सर होता है। फंड मैनेजर नौकरी बदलते हैं, रिटायर होते हैं, या कंपनी उन्हें हटा देती है।
नीलम ने एक स्टार फंड मैनेजर के नाम पर एक फंड में निवेश किया था। वह मैनेजर दस साल से लगातार बाजार को हरा रहा था। लेकिन दो साल बाद वह दूसरी कंपनी में चला गया। नए मैनेजर की स्टाइल बिल्कुल अलग थी। फंड का करैक्टर ही बदल गया। नीलम को समझ नहीं आया कि फंड में रहें या निकल जाएं।
इंडेक्स फंड में यह समस्या नहीं। फंड मैनेजर कौन है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका काम सिर्फ इंडेक्स को ट्रैक करना है।
स्टाइल ड्रिफ्ट की समस्या
कई बार एक्टिव फंड अपनी घोषित स्ट्रैटेजी से भटक जाते हैं। मान लीजिए आपने एक लार्ज कैप फंड में निवेश किया था। लेकिन फंड मैनेजर को लगता है कि मिडकैप में ज्यादा मौके हैं। तो वह धीरे-धीरे मिडकैप में निवेश बढ़ाने लगता है। अब आपका लार्ज कैप फंड असल में एक मिड कैप फंड बन गया है।
यह स्टाइल ड्रिफ्ट कहलाता है और यह आपकी पोर्टफोलियो प्लानिंग को बिगाड़ सकता है। आपने सोचकर लार्ज कैप में पैसा लगाया था स्थिरता के लिए। लेकिन अब आप अनजाने में मिडकैप का रिस्क ले रहे हैं।
इंडेक्स फंड में यह नहीं हो सकता। निफ्टी पचास हमेशा निफ्टी पचास ही रहेगा। वह अचानक मिडकैप फंड नहीं बन जाएगा।
तो एक आम निवेशक को क्या करना चाहिए?
यह सवाल सोनिया ने भी खुद से पूछा। उन्होंने सारा डेटा देखा, सारी बातें समझीं। फिर उन्होंने एक सरल फैसला लिया।
उनके पोर्टफोलियो का अस्सी प्रतिशत इंडेक्स फंड्स में रहेगा। यह उनका कोर होल्डिंग होगा। निफ्टी पचास में पचास प्रतिशत, निफ्टी नेक्स्ट पचास में बीस प्रतिशत, और अंतर्राष्ट्रीय इंडेक्स में दस प्रतिशत।
बाकी बीस प्रतिशत वे एक या दो अच्छे एक्टिव फंड्स में रखेंगी। इसके दो कारण हैं। एक तो अगर भाग्य से कोई फंड वाकई बहुत अच्छा करे, तो उसका फायदा मिल जाए। दूसरा, अगर एक्टिव फंड खराब भी करे, तो उनके कुल पोर्टफोलियो पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
यह एक संतुलित दृष्टिकोण है। आपका ज्यादातर पैसा सुरक्षित इंडेक्स फंड्स में है, लेकिन थोड़ा हिस्सा एक्टिव फंड्स में भी है अगर वे कुछ एक्स्ट्रा रिटर्न दे सकें तो।
याद रखने योग्य बातें
पिछले दस साल में अस्सी प्रतिशत एक्टिव फंड्स इंडेक्स को हरा नहीं पाए। यह सिर्फ भारत की बात नहीं, दुनिया भर में यही देखा गया है। एक्टिव फंड्स की मुख्य समस्याएं हैं – ऊंची लागत, फंड मैनेजर रिस्क, टैक्स इनएफिशिएंसी, और असंगत परफॉर्मेंस।
जो फंड आज अच्छा कर रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी अच्छा करे। पिछले परफॉर्मेंस से भविष्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इंडेक्स फंड का परफॉर्मेंस भले ही एवरेज हो, लेकिन वह भरोसेमंद और अनुमानित है।
लार्ज कैप में इंडेक्स फंड ज्यादातर मामलों में बेहतर विकल्प है। मिडकैप और स्मॉलकैप में अगर आप रिस्क ले सकते हैं, तो एक अच्छा एक्टिव फंड आजमा सकते हैं। लेकिन अपने कुल पोर्टफोलियो का केवल एक छोटा हिस्सा ही एक्टिव फंड्स में रखें।
सबसे महत्वपूर्ण बात – सरलता चुनें। इंडेक्स फंड आपको मानसिक शांति देता है। आपको हर तिमाही फंड मैनेजर का परफॉर्मेंस चेक नहीं करना पड़ता। आपको यह चिंता नहीं होती कि फंड मैनेजर बदल गया तो क्या होगा। आप बस निवेश करते रहिए और अपनी जिंदगी जीइए।
अगली सीढ़ी
अब जब आप समझ गए हैं कि इंडेक्स फंड और एक्टिव फंड में क्या फर्क है और ज्यादातर मामलों में इंडेक्स फंड क्यों बेहतर है, अगला सवाल है – फिक्स्ड डिपॉजिट के साथ तुलना कैसी है?
अगले अध्याय में हम देखेंगे कि इंडेक्स फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट में क्या अंतर है। भारतीय परिवारों की पहली पसंद एफडी है, लेकिन क्या वह वाकई में सुरक्षित निवेश है? महंगाई का असर क्या है? कौन सा विकल्प किस स्थिति में बेहतर है? यह सब हम अगले अध्याय में विस्तार से समझेंगे।
याद रखें:
“औसत से बेहतर बनने की कोशिश में, ज्यादातर लोग औसत से भी नीचे आ जाते हैं। औसत को स्वीकार करना ही अक्सर सबसे समझदारी भरा फैसला होता है।”
अगला अध्याय: “इंडेक्स फंड बनाम फिक्स्ड डिपॉजिट: कौन बेहतर?”
